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BRICS करेंसी से डॉलर का दबदबा होगा खत्म? भारत का रुपया और डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर जोर, सामने आईं बड़ी चुनौतियां

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अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को कम करने के लिए BRICS देश वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर काम कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया को डी-डॉलराइजेशन कहा जाता है। इसका मकसद सदस्य देशों के बीच व्यापार में डॉलर पर निर्भरता घटाना और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।

BRICS करेंसी की चर्चा के बीच भारत ने भी अपनी रणनीति स्पष्ट की है। भारत साझा मुद्रा के बजाय रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है। हालांकि, इस योजना के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं।

क्या है BRICS करेंसी का पूरा विचार?

BRICS करेंसी का मतलब ऐसी साझा मुद्रा या वित्तीय व्यवस्था से है, जिसके जरिए सदस्य देश आपस में व्यापार करते समय अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम कर सकें।

इसको लेकर मुख्य रूप से दो मॉडल की चर्चा होती रही है:

  • साझी मुद्रा: यूरो की तर्ज पर BRICS देशों के लिए एक साझा कागजी या डिजिटल करेंसी तैयार करना।
  • स्थानीय मुद्राओं में व्यापार: भारत के रुपये, चीन के युआन और रूस के रूबल जैसी राष्ट्रीय मुद्राओं में सीधे आयात-निर्यात करना।

दूसरे मॉडल में सदस्य देशों के डिजिटल बैंकिंग और भुगतान नेटवर्क को आपस में जोड़ने की संभावना भी शामिल है।

भारत का क्या है रुख?

भारत का मानना है कि रातों-रात एक साझा मुद्रा बनाना आसान नहीं होगा। इसके लिए सभी सदस्य देशों के बीच आर्थिक नीतियों और वित्तीय व्यवस्था को लेकर व्यापक सहमति जरूरी होगी।

इसी वजह से भारत अपनी घरेलू मुद्रा रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने पर जोर देता रहा है। इसके साथ ही UPI और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को दूसरे देशों के बैंकिंग नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में भी चर्चा होती रही है।

इससे सीमा पार भुगतान को आसान, तेज और पारदर्शी बनाने में मदद मिल सकती है।

डॉलर की बादशाहत पर क्या होगा असर?

अगर BRICS देश अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं या वैकल्पिक डिजिटल सिस्टम के जरिए व्यापार बढ़ाते हैं, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

इसके संभावित प्रभाव:

  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है।
  • विकासशील देशों को अपनी मुद्राओं में व्यापार करने का अधिक अवसर मिल सकता है।
  • अमेरिकी मौद्रिक नीतियों और आर्थिक प्रतिबंधों के प्रभाव से कुछ हद तक बचाव हो सकता है।
  • सदस्य देशों की वित्तीय स्वतंत्रता और सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है।

हालांकि, डॉलर का वैश्विक दबदबा खत्म होना आसान नहीं है। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और मजबूत वित्तीय ढांचे की जरूरत होगी।

BRICS करेंसी की राह में बड़ी चुनौतियां

साझी मुद्रा की योजना के सामने कई आर्थिक और राजनीतिक अड़चनें हैं। BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाओं, महंगाई दरों और राजकोषीय नीतियों में काफी अंतर है।

एक साझा मुद्रा के लिए केंद्रीय बैंक जैसी व्यवस्था बनानी होगी। इसके लिए सदस्य देशों को अपनी मौद्रिक नीतियों पर कुछ नियंत्रण साझा करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, भारत और चीन के बीच भू-राजनीतिक तनाव और आपसी अविश्वास भी बड़ी चुनौती है। ऐसे में एक साझा वित्तीय ढांचे पर सभी देशों की सहमति बनाना मुश्किल हो सकता है।

क्या BRICS करेंसी सच में डॉलर को चुनौती दे पाएगी?

BRICS देशों की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव ला सकती है। लेकिन साझा करेंसी का गठन और डॉलर के वर्चस्व को खत्म करना अभी भी लंबी प्रक्रिया है।

भारत के लिए रुपये में व्यापार और डिजिटल पेमेंट नेटवर्क को मजबूत करना एक व्यावहारिक रास्ता हो सकता है। अब देखना होगा कि BRICS देश इस दिशा में कितना आगे बढ़ते हैं और क्या यह व्यवस्था अमेरिकी डॉलर के दबदबे को वास्तव में चुनौती दे पाती है।

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