जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में NIA की विशेष अदालत ने 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। 16 सितंबर 2026 को आए इस फैसले में दो महिलाएं और आठ पुरुष शामिल हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट की मंजूरी के बाद ही सजा लागू होगी। तब तक सभी दोषी जगदलपुर केंद्रीय जेल में रहेंगे।
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर हुए इस हमले में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं समेत 27 लोगों की मौत हुई थी। कुछ रिपोर्टों में कुल मृतकों की संख्या 29 बताई गई है। मामले की सुनवाई करीब 13 साल चली और 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए।
हाईकोर्ट की मंजूरी के बाद ही लागू होगी फांसी
NIA कोर्ट ने सभी 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। बचाव पक्ष को फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने के लिए 30 दिन का समय दिया गया है।
जब तक हाईकोर्ट सजा की पुष्टि नहीं करता, तब तक फांसी नहीं दी जाएगी। सभी दोषी फिलहाल जगदलपुर केंद्रीय जेल में बंद रहेंगे।
अभियोजन पक्ष ने दोषियों के लिए फांसी की मांग की थी, जबकि बचाव पक्ष ने सजा कम करने की दलील दी थी।
2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुआ था हमला
25 मई 2013 की शाम कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला सुकमा की ओर से लौट रहा था। जब यह काफिला बस्तर के दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी से गुजर रहा था, तभी माओवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया।
हमले की शुरुआत IED विस्फोट से हुई। इसके बाद सड़क पर पेड़ गिराकर रास्ता रोका गया और जंगल से काफिले पर फायरिंग की गई।
इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत कई प्रमुख नेताओं की जान चली गई।
यह हमला छत्तीसगढ़ की राजनीति के लिए सबसे बड़े और दर्दनाक हमलों में से एक माना जाता है।
किन 10 दोषियों को सुनाई गई फांसी?
अदालत ने इन 10 आरोपियों को दोषी ठहराया है:
- प्रमिला मोडियम
- चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना
- सुमित्रा पुनेम मोडियम
- मुक्का मंडवी
- कोसा कवासी उर्फ कोसाराम
- आयाता मरकाम
- मड़कामी देवा
- जोगा मड़कामी
- बंजामी सन्ना उर्फ चामरू
- महादेव नाग
इनमें प्रमिला मोडियम और सुमित्रा पुनेम मोडियम दो महिला दोषी हैं।
परिजनों का दावा- कोसा नक्सली नहीं था
दोषी ठहराए गए कोसा कवासी के ममेरे भाई ने अदालत के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कोसा नक्सली नहीं था और जब उसे पकड़ा गया, तब वह घर में खाना बना रहा था।
परिजनों ने कहा कि वकील के माध्यम से अब हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। उनका दावा है कि कोसा को गलत तरीके से मामले में फंसाया गया है।
वहीं, अभियोजन पक्ष के वकील ने कहा कि अदालत आरोपों से नहीं, बल्कि सबूतों से चलती है। NIA की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों और गवाहों के बयानों के आधार पर अदालत ने दोषियों को सजा सुनाई है।
क्या 10 दोषी ही पूरी साजिश के जिम्मेदार थे?
झीरम हमले में 10 दोषियों को फांसी की सजा मिलने के बाद एक बड़ा सवाल फिर उठ रहा है।
क्या इतने बड़े राजनीतिक हमले की पूरी साजिश सिर्फ इन 10 लोगों तक सीमित थी?
हमले में कांग्रेस की प्रदेश स्तरीय शीर्ष नेतृत्व पंक्ति का बड़ा हिस्सा खत्म हो गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि हमले की योजना किस स्तर पर बनी थी, टारगेट किसने तय किया और काफिले की जानकारी माओवादियों तक कैसे पहुंची?
सीनियर पत्रकारों ने भी इस मामले में बड़े नेटवर्क और मास्टरमाइंड की भूमिका की जांच पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, मौजूदा अदालत का फैसला ट्रायल में शामिल 10 आरोपियों की दोषसिद्धि तक सीमित है।
भूपेश बघेल के साजिश वाले बयान पर भी सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लंबे समय से झीरम हमले को सिर्फ नक्सली हमला नहीं, बल्कि बड़ी साजिश बताते रहे हैं। वे कई बार कह चुके हैं कि उनकी जेब में झीरम की साजिश के सबूत हैं।
इसी बयान को लेकर सवाल उठता रहा है कि अगर उनके पास साजिश से जुड़े सबूत हैं, तो उन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
यह राजनीतिक बहस लंबे समय से जारी है। मौजूदा NIA कोर्ट के फैसले में सजा पाए 10 दोषियों की भूमिका पर निर्णय हुआ है। इससे अलग व्यापक साजिश और अन्य जिम्मेदार लोगों से जुड़े सवालों का जवाब अभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
4,184 पेज की जांच आयोग रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं
झीरम मामले की जांच के लिए 2013 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग बनाया था।
2021 में आयोग ने करीब 4,184 पेज की रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी। इसके बाद रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने रिपोर्ट को अधूरा बताते हुए इसे सार्वजनिक नहीं करने की बात कही थी। बाद में आयोग का पुनर्गठन किया गया, लेकिन इस पर हाईकोर्ट में मामला पहुंच गया।
2022 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पुनर्गठित जांच आयोग के कामकाज पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी थी।
इस तरह झीरम मामले में NIA की जांच और न्यायिक आयोग की जांच दोनों अलग-अलग स्तरों पर चलती रहीं। लेकिन हमले की पूरी तस्वीर और व्यापक जिम्मेदारी को लेकर सवाल अब भी उठते हैं।
33 आरोपी अब भी फरार बताए जा रहे
मामले में 10 दोषियों को सजा सुनाई गई है। एक आरोपी की ट्रायल के दौरान मौत हो गई थी। वहीं, चार्जशीट में नामजद कई अन्य आरोपी अब भी फरार बताए जा रहे हैं।
जांच से जुड़े रिकॉर्ड के अनुसार, थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी और बारसे देवा जैसे बड़े माओवादी नेताओं के नाम भी मामले में सामने आए थे। दोनों ने 2026 में तेलंगाना में सरेंडर किया।
इसके बावजूद इनकी भूमिका और झीरम हमले से जुड़े व्यापक नेटवर्क को लेकर सवाल बने हुए हैं।
सबसे बड़े वांछित आरोपियों में मुपल्ला लक्ष्मणा राव उर्फ गणपति का नाम भी सामने आता है। वह घटना के समय CPI माओवादी का महासचिव था।
13 साल बाद फैसला, लेकिन कई सवाल बाकी
झीरम घाटी हमले में 10 दोषियों को फांसी की सजा सुनाए जाने से मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी पड़ाव आया है। हालांकि, हाईकोर्ट की पुष्टि और अपील की प्रक्रिया अभी बाकी है।
पीड़ित परिवारों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण है, लेकिन हमले की पूरी साजिश, अन्य आरोपियों की भूमिका, सुरक्षा व्यवस्था में चूक और जांच से जुड़े सवालों पर बहस अभी भी जारी है।
झीरम घाटी हमला छत्तीसगढ़ के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसकी पूरी सच्चाई सामने आने की मांग आज भी उठती रही है।