Ashirvaad Atta Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने 25 अगस्त को ITC के ‘आशीर्वाद एमपी चक्की आटा’ के फूड बिजनेस लाइसेंस को रद्द करने की FSSAI की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने फिलहाल FSSAI को ITC के लाइसेंस के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर को होगी।
क्या है पूरा मामला?
विवाद ITC के ‘आशीर्वाद एमपी चक्की आटा’ की पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जा रहे कुछ दावों को लेकर है। कंपनी अपने उत्पाद के पैकेट और प्रमोशनल सामग्री में ‘100% आटा’, ‘100% मध्य प्रदेश गेहूं’ और ‘0% मैदा’ जैसे दावे करती है।
FSSAI का कहना है कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और प्रचार में ‘100%’ जैसे दावों का इस्तेमाल उसकी मई 2025 की एडवाइजरी के अनुरूप नहीं है। नियामक के मुताबिक, इस तरह की भाषा उपभोक्ताओं के बीच भ्रम पैदा कर सकती है।
28 अगस्त से पहले मिली अंतरिम राहत
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने FSSAI को ITC के फूड बिजनेस लाइसेंस को रद्द करने के संबंध में फिलहाल कोई अंतिम कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है।
ITC की ओर से कोर्ट को बताया गया कि FSSAI ने 13 अगस्त को जो इम्प्रूवमेंट नोटिस जारी किया था, उसका पालन करने की समयसीमा 28 अगस्त को समाप्त हो रही थी। कंपनी ने इसी आधार पर अदालत से अंतरिम राहत की मांग की थी।
FSSAI ने पहले जारी किया था कारण बताओ नोटिस
FSSAI ने 10 अगस्त को ITC को कारण बताओ नोटिस जारी कर 30 दिनों में जवाब मांगा था। इसके केवल तीन दिन बाद, 13 अगस्त को FSSAI की क्षेत्रीय अथॉरिटी ने इम्प्रूवमेंट नोटिस जारी कर कंपनी को अनुपालन के लिए 15 दिन का समय दिया।
ITC ने इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अदालत का रुख किया।
ITC ने कोर्ट में क्या दलील दी?
कंपनी की ओर से वरिष्ठ वकील संदीप सेठी ने कई महत्वपूर्ण तर्क रखे। ITC का कहना था कि:
- कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के लिए 30 दिन दिए गए थे, लेकिन उससे पहले ही 15 दिन की समयसीमा वाला इम्प्रूवमेंट नोटिस जारी कर दिया गया।
- केवल एक एडवाइजरी के आधार पर बाध्यकारी प्रतिबंध लागू नहीं किया जा सकता।
- खाद्य सुरक्षा नियमों में बदलाव के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
- FSSAI ने आटे में मैदा मिलाने या मध्य प्रदेश के बाहर का गेहूं इस्तेमाल करने जैसा कोई आरोप नहीं लगाया है।
FSSAI ने अधिकार क्षेत्र पर उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान FSSAI ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका की पोषणीयता पर भी आपत्ति जताई। उसका कहना था कि इम्प्रूवमेंट नोटिस कोलकाता स्थित क्षेत्रीय अथॉरिटी ने जारी किया है, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं बनता।
FSSAI ने यह भी तर्क दिया कि खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 32(4) के तहत ITC को पहले फूड सेफ्टी कमिश्नर के समक्ष वैधानिक अपील करनी चाहिए थी।
ITC ने क्षेत्राधिकार पर क्या कहा?
ITC ने धारा 10(5) का हवाला देते हुए कहा कि मामला केंद्रीय लाइसेंस से संबंधित है। कंपनी के मुताबिक, ऐसे मामलों में FSSAI के CEO फूड सेफ्टी कमिश्नर की शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं और चूंकि CEO का मुख्यालय दिल्ली में है, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई कर सकता है।
अब 9 सितंबर को क्या होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट पहले यह तय करेगा कि इस मामले की सुनवाई का क्षेत्रीय अधिकार उसके पास है या नहीं। कोर्ट ने दोनों पक्षों को इस मुद्दे पर संक्षिप्त लिखित नोट दाखिल करने को कहा है।
फिलहाल FSSAI ITC के लाइसेंस को रद्द करने जैसा कोई कठोर कदम नहीं उठा सकता। मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर 2026 को होगी।
‘100%’ दावे पर FSSAI का क्या रुख?
FSSAI के अनुसार पैकेज्ड फूड पर ‘100% प्योर’, ‘100% नेचुरल’ या ‘0% मैदा’ जैसे दावे उपभोक्ताओं को यह धारणा दे सकते हैं कि दूसरे ब्रांड के उत्पाद मिलावटी हैं। नियामक चाहता है कि कंपनियां खाद्य उत्पादों के बारे में सटीक और प्रमाणित तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल करें।
धारा 32 क्या है?
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 32 के तहत यदि खाद्य सुरक्षा अधिकारी को किसी खाद्य व्यवसाय में सुधार की जरूरत दिखाई देती है, तो वह इम्प्रूवमेंट नोटिस जारी कर सकता है। इसके खिलाफ फूड सेफ्टी कमिश्नर के समक्ष अपील का प्रावधान है।