चयन नहीं होने का तर्क देकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता आयोग, उत्तरपुस्तिका में लापरवाही पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) की मुख्य परीक्षा की उत्तरपुस्तिका से चार पन्ने गायब मिलने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति पीपी साहू की पीठ ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए प्रभावित अभ्यर्थी को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को तीन महीने के भीतर मुआवजे की राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभ्यर्थी के चयन की संभावना कम होने का तर्क देकर आयोग अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। उत्तरपुस्तिका के पन्ने गायब होने की जानकारी मिलने के बावजूद उचित कार्रवाई नहीं करना आयोग की गंभीर चूक है।
2018 की भर्ती परीक्षा से जुड़ा है मामला
यह मामला बिलासपुर निवासी नारायण दत्त की याचिका से संबंधित है। उन्होंने वर्ष 2018 में CGPSC की राज्य सिविल सेवा भर्ती परीक्षा के लिए आवेदन किया था। प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे मुख्य परीक्षा में शामिल हुए, लेकिन अंतिम चयन सूची में जगह नहीं बना सके।
इसके बाद अभ्यर्थी ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत अपनी उत्तरपुस्तिका की प्रति मांगी। प्राप्त जानकारी में पता चला कि उनकी उत्तरपुस्तिका के चार पन्ने गायब थे।
सामान्य अध्ययन के पेपर से गायब थे चार पन्ने
उत्तरपुस्तिका की जांच में सामने आया कि सामान्य अध्ययन-5 यानी पेपर-7 के भाग-2 में पेज नंबर 17 से 20 तक उपलब्ध नहीं थे। इन पन्नों पर प्रश्न क्रमांक 9 से 12 तक के उत्तर लिखे गए थे। इन प्रश्नों के कुल अंक 30 निर्धारित थे।
अभ्यर्थी ने 5 फरवरी 2021 को इस मामले में संबंधित अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने न्याय पाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मूल रिकॉर्ड पेश कराने, मामले की स्वतंत्र जांच कराने और 50 लाख रुपये मुआवजा दिलाने की मांग की थी।
आयोग ने कहा- पूरे अंक मिलने पर भी नहीं होता चयन
सुनवाई के दौरान आयोग ने अदालत को बताया कि मूल्यांकनकर्ता ने 27 सितंबर 2019 को ही उत्तरपुस्तिका के चार पन्ने गायब होने की जानकारी दे दी थी।
आयोग की ओर से दलील दी गई कि यदि अभ्यर्थी को गायब पन्नों के सभी 30 अंक भी मिल जाते, तब भी उनका कुल स्कोर 725.5 अंक ही होता। जबकि अनारक्षित वर्ग के अंतिम चयनित अभ्यर्थी के 737.5 अंक थे।
आयोग के अनुसार, याचिकाकर्ता को वास्तव में 695.5 अंक मिले थे। इस आधार पर आयोग ने तर्क दिया कि गायब पन्नों के पूरे अंक मिलने के बाद भी उनका चयन नहीं हो पाता।
हाईकोर्ट ने आयोग की दलील क्यों खारिज की?
हाईकोर्ट ने माना कि चयन की संभावना नहीं होने का तर्क देकर आयोग उत्तरपुस्तिका में हुई गंभीर चूक की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि उत्तरपुस्तिका के पन्ने गायब होने की जानकारी मिलने के बाद भी अभ्यर्थी को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई। इसके अलावा, गलती के लिए जिम्मेदार व्यक्ति का पता लगाने और मामले की जांच पूरी करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए।
मानसिक परेशानी और कानूनी खर्च को माना आधार
हाईकोर्ट ने कहा कि आयोग की लापरवाही के कारण अभ्यर्थी को मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा। अपने मामले की जानकारी जुटाने और न्याय पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने में भी उन्हें खर्च उठाना पड़ा।
इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अभ्यर्थी को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। संबंधित अधिकारियों को तीन महीने के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया गया है।
CGPSC की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
यह मामला प्रतियोगी परीक्षाओं की उत्तरपुस्तिकाओं के रखरखाव, मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता और अभ्यर्थियों की शिकायतों पर समय पर कार्रवाई की अहमियत को सामने लाता है। हाईकोर्ट के आदेश से यह संदेश भी मिलता है कि चयन पर असर पड़ने की दलील देकर किसी प्रशासनिक चूक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।