भारतीय निर्वाचन आयोग ने Special Intensive Revision (SIR) को लेकर Form-6 में किए गए एक अहम बदलाव को वापस ले लिया है। अब जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां नए मतदाताओं के लिए ऑनलाइन Form-6 भरते समय SIR से जुड़ा अतिरिक्त घोषणा पत्र नहीं दिखाई देगा। यह बदलाव 30 सितंबर 2026 को ECINET पोर्टल पर किया गया।
क्या बदला है?
Form-6 का इस्तेमाल पहली बार मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए किया जाता है। पहले SIR से जुड़े अतिरिक्त प्रावधान के तहत आवेदक से उसके या परिवार के सदस्यों के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी मांगी जा रही थी।
SIR पूरा हो चुके राज्यों में अब यह अतिरिक्त घोषणा हटाई जा रही है। हालांकि, जिन राज्यों या क्षेत्रों में SIR की प्रक्रिया जारी है, वहां यह प्रावधान अभी लागू रह सकता है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
Form-6 में SIR से संबंधित अतिरिक्त घोषणा जोड़े जाने को लेकर निर्वाचन आयोग के भीतर भी आपत्तियां सामने आई थीं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि Form-6 एक वैधानिक फॉर्म है और उसमें बदलाव के लिए Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
हालांकि, इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग की ओर से यह भी कहा गया था कि SIR से संबंधित आदेशों को तीनों आयुक्तों ने मंजूरी दी थी और Form-6 को लेकर विवाद मुख्य रूप से ऑनलाइन सिस्टम में अतिरिक्त घोषणा को शामिल करने से संबंधित था।
नए मतदाताओं के लिए क्या होगा?
SIR पूरा हो चुके राज्यों में नए वोटर को Form-6 भरते समय उस अतिरिक्त SIR घोषणा को पूरा करने की जरूरत नहीं होगी। इससे ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पहले की तुलना में सरल हो जाएगी।
निर्वाचन आयोग के मौजूदा Form-6 में नए मतदाता के नाम, रिश्तेदार की जानकारी, मोबाइल नंबर, आधार संबंधी विकल्प, जन्मतिथि और निवास जैसी सामान्य जानकारियां मांगी जाती हैं।
SIR वाले राज्यों में अलग व्यवस्था
यह बदलाव सभी राज्यों पर एक साथ लागू नहीं है। जहां SIR पूरा हो चुका है, वहां अतिरिक्त घोषणा हटाई गई है; जहां प्रक्रिया अभी चल रही है, वहां SIR से जुड़ी व्यवस्था जारी रह सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक तरफ नए मतदाताओं के ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव आया है, वहीं दूसरी तरफ Form-6 में SIR संबंधी प्रावधान को लेकर निर्वाचन आयोग के भीतर सामने आई आपत्तियों ने चुनावी पंजीकरण प्रक्रिया में नियमों और प्रक्रियात्मक अधिकारों को लेकर चर्चा भी तेज कर दी है।