बस्तर में शांति के लिए दोनों पक्षों को आगे आना होगा – कांग्रेस
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सल समस्या के समाधान के लिए नक्सलियों ने सरकार को शांति वार्ता का प्रस्ताव भेजा है। इसके जवाब में, कांग्रेस पार्टी ने इस पहल का स्वागत किया है और कहा कि अगर यह प्रस्ताव वास्तविक है तो सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। कांग्रेस का मानना है कि बस्तर में स्थायी शांति लाने के लिए दोनों पक्षों को आगे आना होगा और मिलकर हल निकालना होगा।
नक्सलियों का प्रेस नोट – क्या हैं प्रमुख बातें?
नक्सलियों ने सीपीआई (माओवादी) केंद्रीय समिति के प्रवक्ता अभय के माध्यम से एक प्रेस नोट जारी किया।
इस नोट में उन्होंने भारत सरकार से ‘ऑपरेशन कगार’ को रोकने की अपील की और शांति वार्ता के लिए कुछ शर्तें रखी।
1. शांति वार्ता की अपील और युद्ध विराम की मांग
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सीपीआई (माओवादी) ने सरकार से बिना शर्त युद्ध विराम की मांग की है।
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उनका कहना है कि मध्य भारत में चल रहे माओवादी संघर्ष को समाप्त करने के लिए बातचीत होनी चाहिए।
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शांति वार्ता के लिए दोनों पक्षों को आगे आकर समाधान निकालना होगा।
2. ‘ऑपरेशन कगार’ पर रोक लगाने की मांग
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केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में ‘ऑपरेशन कगार’ नामक आतंकवाद विरोधी अभियान शुरू किया है।
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नक्सलियों का दावा है कि इस अभियान के तहत बड़ी संख्या में निर्दोष आदिवासियों को मारा गया है।
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उनका कहना है कि इस ऑपरेशन को रोककर ही शांति वार्ता की जा सकती है।
3. मानवाधिकारों के उल्लंघन और हताहतों का आरोप
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नक्सलियों का दावा है कि इस अभियान के कारण 400 से अधिक माओवादी नेता, कार्यकर्ता और आदिवासी नागरिक मारे गए हैं।
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महिला माओवादियों के साथ सामूहिक यौन हिंसा और फांसी जैसी घटनाएं हुई हैं, जिसका वे विरोध कर रहे हैं।
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कई नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया और यातनाएं दी गईं, यह भी उनका बड़ा आरोप है।
4. शांति वार्ता के लिए नक्सलियों की शर्तें
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माओवादी प्रभावित क्षेत्रों से सुरक्षा बलों को हटाया जाए।
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नई सैन्य तैनाती पूरी तरह से रोकी जाए।
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आतंकवाद विरोधी अभियानों को तत्काल निलंबित किया जाए।
5. सरकार पर आरोप – आदिवासियों के खिलाफ ‘नरसंहार युद्ध’ छेड़ने का आरोप
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नक्सलियों का आरोप है कि सरकार आदिवासियों के खिलाफ नरसंहार कर रही है।
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उन्होंने कहा कि सरकार क्रांतिकारी आंदोलनों को कुचलने के लिए आदिवासी समुदायों पर अत्याचार कर रही है।
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नागरिक इलाकों में सैन्य बलों का उपयोग संविधान के खिलाफ बताया गया है।
6. बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार संगठनों से समर्थन की अपील
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नक्सलियों ने बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों, छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे सरकार पर शांति वार्ता शुरू करने का दबाव बनाएं।
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उन्होंने राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने का अनुरोध किया, ताकि बातचीत को बल मिल सके।
7. बातचीत के लिए नक्सलियों की तत्परता
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नक्सलियों ने कहा कि अगर सरकार उनकी शर्तों को मानती है, तो वे तुरंत बातचीत के लिए तैयार हैं।
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उनका कहना है कि जैसे ही सरकार सैन्य अभियान बंद करेगी, वे युद्ध विराम की घोषणा कर देंगे।
कांग्रेस ने नक्सलियों के प्रस्ताव पर क्या कहा?
कांग्रेस पार्टी ने इस शांति प्रस्ताव का समर्थन किया है, लेकिन सरकार से ठोस निर्णय लेने की अपील की है।
कांग्रेस के मुख्य बयान:
✅ अगर नक्सलियों का प्रस्ताव वास्तविक है, तो सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
✅ बस्तर में स्थायी शांति के लिए दोनों पक्षों को आगे आना होगा।
✅ सरकार को आदिवासियों के हित को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेना चाहिए।
बस्तर में नक्सल समस्या – ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
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बस्तर क्षेत्र में माओवादी आंदोलन पिछले कई दशकों से चला आ रहा है।
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आदिवासी समुदाय और सरकार के बीच लंबे समय से संघर्ष की स्थिति बनी हुई है।
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नक्सली खुद को आदिवासियों के रक्षक बताते हैं, जबकि सरकार उन्हें आतंकी संगठन मानती है।
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इस संघर्ष में अब तक हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जिसमें सुरक्षा बलों के जवान, आम नागरिक और माओवादी कार्यकर्ता शामिल हैं।
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सरकार ने कई बार ऑपरेशन चलाकर नक्सलियों का सफाया करने की कोशिश की, लेकिन अभी तक पूरी तरह सफलता नहीं मिली।
क्या शांति वार्ता से नक्सल समस्या का हल निकल सकता है?
शांति वार्ता कई बार हुई है, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
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2004 में आंध्र प्रदेश सरकार और माओवादियों के बीच वार्ता हुई, लेकिन कोई हल नहीं निकला।
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2010 में केंद्र सरकार ने माओवादियों से बातचीत की पेशकश की, लेकिन माओवादी तैयार नहीं हुए।
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2018 में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भी नक्सलियों को बातचीत का प्रस्ताव दिया था, लेकिन वे नहीं माने।
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अब फिर से नक्सली शांति वार्ता के लिए तैयार दिख रहे हैं, लेकिन सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार है।
समाज और सरकार को क्या करना चाहिए?
अगर वास्तव में नक्सली शांति चाहते हैं, तो सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
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आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर देने चाहिए।
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नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को बढ़ाना चाहिए, ताकि लोग नक्सलवाद का समर्थन छोड़ सकें।
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शांति वार्ता में निष्पक्ष और प्रभावी मध्यस्थता की जरूरत है, ताकि दोनों पक्षों के बीच विश्वास बने।
मुख्य बिंदु (Highlights):
✅ नक्सलियों ने सरकार से शांति वार्ता की अपील की
✅ ऑपरेशन कगार को बंद करने की मांग की
✅ 400 से अधिक माओवादी और आदिवासी नागरिकों की मौत का दावा
✅ महिला माओवादियों के साथ हिंसा और फांसी का आरोप
✅ सुरक्षा बलों की वापसी और सैन्य अभियान रोकने की शर्त
✅ बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और मानवाधिकार संगठनों से समर्थन की अपील
✅ कांग्रेस ने कहा – सरकार को इस प्रस्ताव को गंभीरता से लेना चाहिए
✅ बस्तर में स्थायी शांति के लिए दोनों पक्षों को आगे आना होगा
निष्कर्ष
बस्तर में नक्सल समस्या भारत की सबसे जटिल आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में से एक है। अगर नक्सली सच में शांति चाहते हैं, तो सरकार को उनकी शर्तों पर विचार करना चाहिए और एक ठोस समाधान निकालना चाहिए। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि शांति वार्ता के नाम पर हिंसा को फिर से बढ़ावा न मिले। अब यह देखना होगा कि सरकार इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेती है।