डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम: वो 6 किस्से जो बनाते हैं उन्हें ‘लोगों का राष्ट्रपति’

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भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को हम सब वैज्ञानिक, दूरदर्शी नेता और बच्चों के प्रिय राष्ट्रपति के रूप में जानते हैं। लेकिन उनकी जिंदगी में कई ऐसे अनकहे किस्से छिपे हैं जो न सिर्फ प्रेरणा देते हैं बल्कि यह भी बताते हैं कि कैसे साधारण परिस्थितियों से उठकर उन्होंने असाधारण ऊँचाइयाँ हासिल कीं।
हर साल 15 अक्टूबर को उनका जन्मदिन वर्ल्ड स्टूडेंट्स डे के रूप में मनाया जाता है। आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़े 6 अनसुने किस्से –


किस्सा 1: पिता से सीखी अध्यात्म की गहराई

कलाम का जन्म रामेश्वरम के एक साधारण मुस्लिम परिवार में हुआ। उनके पिता जैनुलाबुद्दीन पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान में बेहद धनी थे। मंदिर के पुजारी लक्ष्मण शास्त्री उनके करीबी दोस्त थे और घंटों धर्म व अध्यात्म पर चर्चा करते।
कलाम कहते थे – “मैंने विज्ञान और तकनीक की दुनिया में भी हमेशा अपने पिता की आध्यात्मिक सोच का अनुसरण किया।”
यही कारण था कि आगे चलकर वे विज्ञान को सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम मानने लगे।


किस्सा 2: क्लास में टोपी पहनने पर पीछे बैठाया गया

पांचवीं कक्षा में कलाम अपने दोस्त रामानाधा शास्त्री (पुजारी का बेटा) के साथ पहली बेंच पर बैठते थे। एक नए टीचर ने यह देखकर उन्हें पीछे बैठा दिया कि “मुस्लिम लड़का ब्राह्मण के बेटे के साथ क्यों बैठा है।”
कलाम ने चुपचाप मान लिया, लेकिन उनका दोस्त फूट-फूटकर रो पड़ा। घर जाकर बात जब पुजारी लक्ष्मण शास्त्री तक पहुँची तो उन्होंने शिक्षक को बुलवाया और कहा – “बच्चों के दिमाग में भेदभाव का जहर मत भरो। या तो माफी माँगो या यह शहर छोड़ दो।”
शिक्षक ने माफी माँगी और कलाम को फिर पहली बेंच पर बैठने दिया।


किस्सा 3: ब्राह्मण पत्नी ने खाना परोसने से इनकार किया

उनके विज्ञान शिक्षक सिवासुब्रमनिया अय्यर प्रगतिशील सोच के थे। एक दिन उन्होंने कलाम को घर बुलाया। लेकिन उनकी पत्नी ने एक मुस्लिम लड़के को रसोई में खाना परोसने से इनकार कर दिया।
अय्यर ने हार नहीं मानी। उन्होंने खुद कलाम को खाना परोसा और साथ बैठकर खाया। अगली बार जब कलाम आए तो उनकी पत्नी ने खुद दोनों को खाना परोसा।
यह अनुभव कलाम के जीवन का एक बड़ा सबक बना – बदलाव लाना आसान नहीं, लेकिन धैर्य और साहस से संभव है।


किस्सा 4: टीचर ने कान खींचा, बाद में किया सम्मान

रामानाथापुरम के श्वार्ट्ज हाई स्कूल में गणित पढ़ाते समय एक बार कलाम गलती से दूसरी क्लास में जा बैठे। टीचर रामाकृष्णा अय्यर ने सबके सामने उनका कान खींचा और डांटा।
लेकिन साल के अंत में जब कलाम ने गणित में पूरे अंक पाए, तो वही शिक्षक असेंबली में बोले – “मैं जिसका भी कान खींचता हूँ, वह बड़ा आदमी बनता है। यह बच्चा एक दिन देश का नाम रोशन करेगा।”
शब्द सच साबित हुए।


किस्सा 5: एक महीने का प्रोजेक्ट 3 दिन में पूरा

MIT में पढ़ाई के दौरान कलाम और उनकी टीम को एयरक्राफ्ट डिजाइन करने का प्रोजेक्ट मिला। प्रोफेसर ने उन्हें कहा – “सोमवार तक डिजाइन तैयार नहीं हुआ तो स्कॉलरशिप रुक जाएगी।”
कलाम ने तीन दिन-तीन रात लगातार काम किया, बिना आराम के। रविवार सुबह डिजाइन तैयार था। प्रोफेसर श्रीनिवासन खुद पहुंचे और बोले – “मुझे उम्मीद थी कि तुम मेहनत करोगे, लेकिन तुमने मेरी उम्मीदों से कहीं ज्यादा किया है।”
यह अनुभव उनके जीवन में अनुशासन और समय-प्रबंधन की मिसाल बन गया।


किस्सा 6: इमली के बीजों से पहली कमाई

दूसरे विश्व युद्ध के समय इमली के बीजों की मांग बढ़ी। आठ साल के कलाम बीज बटोरकर बेचते और रोज़ आठ आने कमाते। बाद में अखबार बाँटने का काम भी किया।
यही उनकी पहली कमाई थी जिसने सिखाया कि मेहनत और आत्मनिर्भरता ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।


निष्कर्ष

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन केवल विज्ञान और मिसाइलों तक सीमित नहीं था। उनका बचपन, उनके किस्से और संघर्ष यह बताते हैं कि महानता किताबों से नहीं, बल्कि अनुभवों, मूल्यों और संघर्षों से पैदा होती है।
यही वजह है कि उन्हें हम सब सिर्फ “भारत के राष्ट्रपति” नहीं बल्कि “लोगों का राष्ट्रपति” कहते हैं।

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