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पटाखे और लाउडस्पीकर किसी धर्म का हिस्सा नहीं: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अभय ओक

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दिल्ली-NCR समेत पूरे देश में वायु प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ रही है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज अभय एस. ओक ने पटाखों और लाउडस्पीकर को लेकर सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि “किसी भी धर्म में पटाखे फोड़ना या लाउडस्पीकर बजाना नहीं लिखा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब तक किसी बड़े नेता या धर्मगुरु ने प्रदूषण रोकने की अपील नहीं की।”

जस्टिस ओक ने यह बात 29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की लेक्चर सीरीज़ में कही। वे ‘क्लीन एयर, क्लाइमेट जस्टिस और सस्टेनेबल फ्यूचर’ विषय पर बोल रहे थे।


पूर्व जज की बड़ी बातें

  • अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) पटाखे फोड़ने, लाखों लोगों का नदियों में नहाने या धार्मिक आयोजनों में लाउडस्पीकर बजाने की इजाजत नहीं देता।

  • हर धर्म प्रकृति और जीवों की रक्षा का संदेश देता है। धर्म के नाम पर प्रदूषण करना गलत आदत बनती जा रही है।

  • पटाखों का शोर और धुआं बुजुर्गों, मरीजों, पक्षियों और जानवरों को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। असली खुशी परिवार और दोस्तों के साथ त्योहार मनाने में है।

  • एयर प्यूरीफायर अमीर लोग खरीद सकते हैं, लेकिन गरीब और झुग्गियों में रहने वाले लोग प्रदूषण का सबसे ज्यादा शिकार होते हैं।

  • अजान और धार्मिक आयोजन बिना लाउडस्पीकर भी हो सकते हैं। मुंबई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुके हैं कि यह जरूरी धार्मिक क्रिया नहीं है।

  • अदालतों और जजों की जिम्मेदारी है कि वे पर्यावरण की रक्षा करें। अगर वे ही मौलिक अधिकारों और प्रकृति की सुरक्षा नहीं करेंगे तो और कौन करेगा?


मूर्ति विसर्जन और जागरूकता

जस्टिस ओक ने कहा कि बड़े-बड़े प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां जब नदियों और झीलों में विसर्जित होती हैं तो जल प्रदूषण बढ़ता है। हालाँकि सरकार द्वारा बनाए गए कृत्रिम तालाब एक अच्छी पहल है, लेकिन समाज में अभी भी जागरूकता की कमी है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई धार्मिक विचारधाराएँ प्रकृति को ईश्वर मानती हैं, लेकिन लोग अपनी सुविधानुसार इस सिद्धांत को नजरअंदाज कर देते हैं।


प्रदूषण को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया

जस्टिस ओक का कहना है कि हवा और पानी को प्रदूषित करना अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार) का उल्लंघन है। उनका मानना है कि साफ और स्वस्थ वातावरण के बिना इंसान गरिमा के साथ जीवन नहीं जी सकता।

उन्होंने कहा— “जब जज पर्यावरण के साथ न्याय करते हैं तो वे सिर्फ इंसानों ही नहीं, बल्कि सभी जीवों और धरती के साथ न्याय करते हैं। मौजूदा हालात में अदालतें ही ऐसी संस्थाएँ हैं जो पर्यावरण की रक्षा कर सकती हैं।”


सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला

15 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल की इजाजत दी थी, लेकिन केवल 18 से 21 अक्टूबर तक। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस विनोद चंद्रन की बेंच ने साफ कहा कि हमें “बैलेंस अप्रोच” अपनानी होगी, लेकिन पर्यावरण से समझौता नहीं करेंगे।


AQI क्यों खतरनाक है?

AQI (Air Quality Index) प्रदूषण का पैमाना है। यह हवा में मौजूद हानिकारक गैसों और कणों जैसे PM2.5, PM10, NO2, Ozone, CO आदि की मात्रा बताता है।

  • 200-300 के बीच AQI को खराब माना जाता है।

  • दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और यूपी के कई शहरों में यह 300 से ऊपर जा चुका है।

यानी हवा अब सिर्फ गंदी नहीं, बल्कि जानलेवा स्तर पर पहुंच गई है।


निष्कर्ष: जस्टिस अभय ओक का संदेश साफ है— धर्म के नाम पर प्रदूषण फैलाना बंद कीजिए। असली धर्म और असली इंसानियत प्रकृति और सभी जीवों की रक्षा करने में है।

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