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बिहार चुनाव: चिराग–कुशवाहा की एंट्री से NDA की जीत हुई और भी मजबूत, ‘अन्य’ वोट 10% घटे—वोट बैंक का पूरा गणित समझें

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बिहार चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक जीत सिर्फ सीटों में नहीं, बल्कि वोट शेयर के पैटर्न में भी साफ नजर आई। इस बार नतीजों का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि जीत का मुख्य कारण महागठबंधन के M-Y समीकरण का टूटना नहीं, बल्कि ‘अन्य’ यानी निर्दलीय और गैर पंजीकृत पार्टियों के वोट में भारी गिरावट और लोजपा(आर) तथा आरएलएम के वोटों का सीधे एनडीए में स्थानांतरण रहा।

पिछले चुनाव में एनडीए और महागठबंधन दोनों का वोट शेयर लगभग बराबर—करीब 37% था। लेकिन इस बार जहां महागठबंधन 37.94% से लगभग वहीं 37.39% पर कायम रहा, वहीं एनडीए के वोट शेयर में करीब 9% की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह बढ़त इस बात का संकेत है कि एनडीए को दोहरा फायदा मिला—एक तरफ लोजपा(आर) और आरएलएम जैसी पार्टियों का सीधा समर्थन, दूसरी तरफ ’अन्य’ वोट बैंक में बड़ी सेंध।

सबसे बड़ा बदलाव ‘अन्य’ श्रेणी में देखने को मिला। पिछले चुनाव में निर्दलीयों और छोटे, गैर-पंजीकृत दलों ने 19.45% वोट हासिल किए थे। इस बार यह आंकड़ा घटकर लगभग 10% रह गया। यानी करीब 10% वोट ऐसे थे, जो अब किसी न किसी बड़े गठबंधन की ओर खिसक गए। इसमें जनसुराज पार्टी ने भी लगभग 3.5% वोट हासिल किए, लेकिन वह बड़े गठबंधनों के वोट बैंक में सेंध नहीं लगा पाई और उसकी पकड़ ’अन्य’ तक ही सीमित रह गई।

लोजपा(आर) और आरएलएम का प्रभाव साफ दिखा। पिछली बार एनडीए से बाहर रहते हुए दोनों दलों को 7.43% वोट मिले थे। इस चुनाव में ये दोनों मिलकर 6.15% वोट पर रहे—यह बताता है कि इनके अधिकतर वोट सीधे और सफलतापूर्वक एनडीए में ट्रांसफर हुए। यही वह कारक है जिसने एनडीए के कुल वोट में 9% की छलांग दिला दी।

महागठबंधन ‘अन्य’ वोटरों को अपने पाले में लाने में पूरी तरह विफल रहा। वीआईपी को एनडीए से अलग करने के बावजूद विपक्षी कैंप को कोई खास फायदा नहीं मिला।

राजद के M-Y समीकरण में भी दिलचस्प तस्वीर सामने आई। मुसलमान वोटों में नाराजगी साफ दिखाई दी और इसका लाभ AIMIM को मिल गया। लेकिन यादव वोटों पर राजद का दबदबा अब भी बरकरार रहा—राजद के 25 में से 11 विधायक इसी बिरादरी के हैं। हालांकि गठबंधन की दृष्टि से इस बार यादव विधायकों की संख्या राजग में ज्यादा हो गई है, जो चुनावी राजनीति के सामाजिक संतुलन को नया मोड़ देती है।

कुल मिलाकर, एनडीए की जीत सिर्फ गठबंधन की मजबूती नहीं बल्कि मतदाताओं की नई दिशा का परिणाम भी है। ’अन्य’ के सिकुड़ते दायरे, सहयोगी दलों का स्पष्ट ट्रांसफर, और विपक्ष का वही पुराना वोट शेयर—इन सबने मिलकर एनडीए की बढ़त को और भी निर्णायक बना दिया।

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