भारतीय रुपया मंगलवार को लगातार दूसरे दिन डॉलर के मुकाबले अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक रुपया आज 28 पैसे फिसलकर 90.43 पर आ गया, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 90.15 पर बंद हुआ था। विदेशी फंड्स की भारी बिकवाली और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता ने रुपए पर गहरा दबाव बनाया है। साल 2025 की शुरुआत से ही रुपया लगभग 5.5% कमजोर हो चुका है। 1 जनवरी को डॉलर के मुकाबले 85.70 पर खड़ा रुपया अब 90 के पार पहुंचकर चिंता बढ़ा रहा है।
रुपए की गिरावट का सीधा असर देश की जेब पर पड़ेगा। आयातित चीजें महंगी होंगी—चाहे वह पेट्रोल-डीजल हो, क्रूड ऑयल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक सामान या फार्मा उत्पाद। विदेश यात्रा और विदेश में पढ़ाई भी और ज्यादा खर्चीली हो जाएगी। पहले जहां 1 डॉलर पाने के लिए 50 या 60 रुपए काफी थे, वहीं अब छात्रों और यात्रियों को 90 रुपए से ज्यादा चुकाने पड़ेंगे। फीस, रहने के खर्च, ट्रैवल और रोजमर्रा की जरूरतें सब पर इसका सीधा बोझ बढ़ेगा।
रुपए की इस तेज गिरावट के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं।
पहली—अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय आयात पर 50% टैरिफ लागू करना, जिसने भारत की GDP ग्रोथ के 60–80 बेसिस पॉइंट तक गिरने की आशंका पैदा कर दी है। इससे निर्यात कम होगा और विदेशी मुद्रा की आमद घटी, परिणामस्वरूप डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया गिर गया।
दूसरी—जुलाई 2025 से अब तक विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) 1.03 लाख करोड़ रुपए से अधिक की बिकवाली कर चुके हैं। निवेशक अनिश्चितता के कारण अपनी होल्डिंग बेचकर डॉलर में कन्वर्ट कर रहे हैं, जिससे रुपये पर दबाव और गहरा हुआ।
तीसरी—तेल और सोने की कंपनियां हेजिंग के लिए लगातार डॉलर खरीद रही हैं, जबकि आयातक भी टैरिफ की अनिश्चितता के चलते डॉलर स्टॉक कर रहे हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपये की कमजोरी और तेज हो गई।
LKP सिक्योरिटीज के रिसर्च एनालिस्ट जतिन त्रिवेदी का कहना है कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर कोई ठोस अपडेट नहीं आने से बाजार में बेचैनी बढ़ी है और इसी कारण रुपये में तेज बिकवाली देखी गई। इसके अलावा, धातुओं और सोने की रिकॉर्ड कीमतों ने भारत के आयात बिल को और भारी बना दिया है, जिससे रुपया और दबाव में आ गया। उन्होंने कहा कि इस बार RBI का हस्तक्षेप भी काफी सीमित रहा है, जिसके चलते कमजोरी और गहरी हो गई।
अब नज़रें शुक्रवार को आने वाली RBI पॉलिसी पर टिक गई हैं। बाजार को उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक करेंसी को स्थिर करने के लिए कुछ ठोस कदम उठा सकता है, क्योंकि तकनीकी रूप से रुपया काफी ओवरसोल्ड स्थिति में पहुंच चुका है।
किसी भी करेंसी की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि उसके मुकाबले डॉलर की मांग कितनी है। भारत का फॉरेन रिजर्व जितना मजबूत होगा, रुपया उतना स्थिर रहेगा। डॉलर रिजर्व घटने पर रुपया कमजोर होता है और रिजर्व बढ़ने पर मजबूत। अभी डॉलर की मांग लगातार बढ़ रही है और रिजर्व पर दबाव बढ़ने से रुपया गिरावट के सिलसिले में फंस गया है।
फिलहाल, रुपए की यह तीखी गिरावट भारत के आयात बिल में भारी उछाल, सोना-क्रूड की और बढ़ती कीमतें और आम उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ का संकेत देती है—वहीं एक्सपोर्टर्स के लिए यह स्थिति राहत भी ला सकती है।