नवंबर में थोक महंगाई में नरमी के बावजूद बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह माइनस 0.32 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अक्टूबर में थोक महंगाई दर माइनस 1.21 प्रतिशत थी, यानी एक महीने में इसमें साफ उछाल देखने को मिला है। इसकी सबसे बड़ी वजह रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों, खासकर खाने-पीने के सामान के दामों में बढ़ोतरी रही है। वाणिज्य मंत्रालय ने 15 दिसंबर को ये आंकड़े जारी किए हैं, जिनसे साफ होता है कि महंगाई भले ही अभी निगेटिव जोन में है, लेकिन दबाव धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
नवंबर में प्राइमरी आर्टिकल्स यानी रोजमर्रा की जरूरत के सामानों की थोक महंगाई माइनस 6.18 प्रतिशत से बढ़कर माइनस 2.93 प्रतिशत हो गई। इसी तरह फूड इंडेक्स के तहत आने वाली खाने-पीने की चीजों की महंगाई माइनस 5.04 प्रतिशत से बढ़कर माइनस 2.60 प्रतिशत दर्ज की गई। फ्यूल और पावर सेक्टर में भी थोड़ी बढ़ोतरी दिखी और इसकी थोक महंगाई दर माइनस 2.55 प्रतिशत से बढ़कर माइनस 2.27 प्रतिशत हो गई। हालांकि मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स में कुछ राहत रही और इनकी महंगाई दर 1.54 प्रतिशत से घटकर 1.33 प्रतिशत पर आ गई।
थोक महंगाई यानी WPI के तीन बड़े घटक होते हैं, जिनमें मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का वेटेज सबसे ज्यादा करीब 64 प्रतिशत से अधिक है। इसके बाद प्राइमरी आर्टिकल्स का वेटेज लगभग 22.6 प्रतिशत और फ्यूल व पावर का करीब 13 प्रतिशत होता है। प्राइमरी आर्टिकल्स के भीतर भी फूड आइटम्स, नॉन-फूड आइटम्स, मिनरल्स और क्रूड पेट्रोलियम जैसे हिस्से शामिल होते हैं, जिनकी कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे WPI को प्रभावित करता है।
थोक महंगाई के साथ-साथ रिटेल महंगाई में भी नवंबर में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। नवंबर में रिटेल महंगाई दर अक्टूबर के 0.25 प्रतिशत से बढ़कर 0.71 प्रतिशत पर पहुंच गई। सब्जियों, अंडा, मांस-मछली, मसालों, फ्यूल और बिजली की कीमतों में इजाफा इसकी मुख्य वजह रहा। रिटेल महंगाई के ये आंकड़े 12 दिसंबर को जारी किए गए थे।
आम आदमी पर थोक महंगाई का असर सीधे तौर पर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन अगर WPI लंबे समय तक ऊंचा बना रहता है तो इसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर ही आता है। जब थोक कीमतें बढ़ती हैं तो निर्माता और कारोबारी धीरे-धीरे वही बढ़ी हुई लागत खुदरा कीमतों में जोड़ देते हैं। सरकार WPI को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से टैक्स से जुड़े कदम उठाती है। उदाहरण के तौर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की जाती रही है, हालांकि इसकी भी एक सीमा होती है।
भारत में महंगाई को दो तरीकों से मापा जाता है। रिटेल महंगाई, जिसे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स कहा जाता है, आम उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है। वहीं थोक महंगाई यानी होलसेल प्राइस इंडेक्स उन कीमतों को दर्शाता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है। दोनों सूचकांकों में शामिल वस्तुओं का वेटेज अलग-अलग होता है, इसलिए कई बार रिटेल और थोक महंगाई की चाल एक-दूसरे से अलग नजर आती है। नवंबर के आंकड़े यही संकेत दे रहे हैं कि महंगाई का दबाव भले ही नियंत्रण में हो, लेकिन खाने-पीने की चीजों के महंगे होने से इसमें फिर से तेजी आ रही है।