जिज्ञासा ही प्रगति की असली ताकत: सीखने की चाह जिंदा रहे तो उम्र और भूमिका मायने नहीं रखती

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तेजी से बदलती दुनिया में आगे बढ़ने की सबसे बड़ी पूंजी जिज्ञासा है। उम्र, पेशा या सामाजिक भूमिका चाहे जो भी हो, नई चीजें जानने और समझने की इच्छा अगर जिंदा है, तो विकास अपने आप रास्ता ढूंढ लेता है। जब हम अपने आसपास किसी नई, अलग या अनजानी चीज़ को देखते हैं और मन में सवाल उठता है—यह क्या है, ऐसा क्यों है, इसके पीछे क्या कहानी है—यहीं से सीखने की यात्रा शुरू होती है। यही सवाल पूछने की प्रवृत्ति जिज्ञासा कहलाती है, जो हर इंसान के भीतर मौजूद होती है और जिसे जीवित रखना ही निरंतर प्रगति का आधार है।

जिज्ञासा केवल जानकारी इकट्ठा करने तक सीमित नहीं रहती। यह हमें लोगों, परिस्थितियों और विचारों को गहराई से समझने का अवसर देती है। जब हम दूसरों की सोच, अनुभव और संवेदनाओं को जानने की कोशिश करते हैं, तो हमारे भीतर सहानुभूति और समझ का विस्तार होता है। ऐसी मानसिकता न सिर्फ सीखने और नवाचार को बढ़ावा देती है, बल्कि अनावश्यक मानसिक थकान और तनाव को भी कम करती है, क्योंकि हम हर चीज़ को तय निष्कर्षों के चश्मे से देखने के बजाय खुले मन से स्वीकार करना सीखते हैं।

खुद से सवाल करना जिज्ञासा का सबसे ईमानदार रूप है। कई बार किसी प्रश्न का तुरंत उत्तर न होना हमें असहज करता है, लेकिन ‘मुझे नहीं पता’ कहना कमजोरी नहीं, बल्कि बौद्धिक विनम्रता है। यह स्वीकार करना कि हर सवाल का जवाब हमारे पास नहीं होता, हमारे अहं को कम करता है और सीखने की संभावनाओं को बढ़ाता है। जब हम हर बात जानने का दिखावा छोड़कर यह पूछते हैं कि मैं इसे और बेहतर कैसे समझ सकता हूं, तो सहयोग की भावना मजबूत होती है और बेहतर समाधान सामने आते हैं।

संवाद में जिज्ञासा का असर और भी स्पष्ट दिखता है। जब कोई व्यक्ति कोई नई या अलग बात साझा करता है और आप उससे कहते हैं, “इसके बारे में थोड़ा और बताइए,” तो यह केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि सच्ची रुचि का संकेत होता है। ऐसा कहने से सामने वाला खुद को सुना और समझा हुआ महसूस करता है। यही संवाद नए विचारों, रचनात्मक सोच और आपसी विश्वास को जन्म देता है, जिससे व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों स्तरों पर बेहतर नतीजे निकलते हैं।

जिज्ञासा को व्यापक बनाने का एक असरदार तरीका है अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों से मिलना। अक्सर हम उन्हीं से सलाह लेते हैं, जो हमारे जैसे क्षेत्र में सफल रहे हों। उनका अनुभव उपयोगी होता है, लेकिन सीमित भी। जब हम भिन्न क्षेत्रों, संस्कृतियों और जीवन अनुभवों वाले लोगों से बातचीत करते हैं, तो सोच के नए दरवाजे खुलते हैं। इससे दृष्टिकोण में विविधता आती है और हम समस्याओं को एक ही नजरिए से नहीं, बल्कि कई कोणों से देख पाते हैं।

अंततः सीखने की प्रक्रिया तब और प्रभावी हो जाती है, जब हम अपने सीखने के तरीके को पहचान लेते हैं। कोई सुनकर बेहतर समझता है, कोई देखकर, कोई सवाल पूछकर और कोई अनुभव से। जब यह स्पष्ट हो जाता है कि हम कैसे सीखते हैं, तो हम सही स्रोतों और सही लोगों से जुड़ पाते हैं। इससे न सिर्फ हमारा नेटवर्क मजबूत होता है, बल्कि निजी और पेशेवर जीवन में भी समझ और संतुलन बेहतर होता है।

जिज्ञासा को जिंदा रखना दरअसल खुद को जिंदा रखना है—सोच में, समझ में और विकास में। यही वह चाबी है, जो हर उम्र और हर भूमिका में हमें आगे बढ़ाती रहती है।

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