मेडिकल कॉलेजों में पीजी सीटें खाली रह जाने की आशंका के बीच नीट पीजी की कटऑफ व्यवस्था में अभूतपूर्व ढील दी गई है। नए फैसले के तहत मॉपअप यानी तीसरे राउंड की काउंसिलिंग से एसटी, एससी और ओबीसी श्रेणी के उन अभ्यर्थियों को भी एमडी-एमएस में प्रवेश के लिए पात्र माना जाएगा, जिनका परसेंटाइल शून्य है, यानी जिनके अंक माइनस 40 तक हैं। इसी तरह सामान्य और ईडब्लूएस श्रेणी के लिए कटऑफ 50 परसेंटाइल से घटाकर 7 परसेंटाइल कर दी गई है, जबकि जनरल पीडब्लूबीडी श्रेणी में यह सीमा 45 से घटकर 5 परसेंटाइल कर दी गई है।
यह निर्णय 13 जनवरी को जारी पत्र के आधार पर लिया गया है और इसका सीधा उद्देश्य विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने वाली पीजी सीटों को लैप्स होने से बचाना बताया जा रहा है। राज्य स्तर पर एमडी-एमएस की काउंसिलिंग इस समय अंतिम चरण में है। दो राउंड की प्रक्रिया के बाद भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की स्थिति बनी हुई है। दूसरे राउंड का राज्य कोटे में प्रवेश अंतिम दिन पर पहुंच चुका है और इसके बाद जो सीटें खाली रहेंगी, उन्हें तीसरे राउंड में शामिल किया जाएगा। छत्तीसगढ़ के सात शासकीय और तीन निजी मेडिकल कॉलेजों में एमडी-एमएस की कुल 593 सीटें हैं, जिनमें से अनुमान है कि पहले दो राउंड में केवल करीब पचास प्रतिशत सीटों पर ही प्रवेश हो पाएगा। तीसरे राउंड में निजी कॉलेजों की बड़ी संख्या में सीटें आने की संभावना है।
हालांकि कटऑफ में इतनी बड़ी रियायत ने चिकित्सा जगत में तीखी बहस छेड़ दी है। चिकित्सा छात्र संगठनों और डॉक्टर संघों ने इसे जनस्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता से सीधा खिलवाड़ बताया है। उनका तर्क है कि शून्य परसेंटाइल का अर्थ यह है कि अभ्यर्थी एक भी प्रश्न सही नहीं कर पाया, और ऐसे स्तर के छात्रों को विशेषज्ञ पाठ्यक्रमों में प्रवेश देना भविष्य के डॉक्टरों और मरीजों—दोनों के लिए खतरनाक संकेत है। न्यूरोसर्जरी, हार्ट सर्जरी और गैस्ट्रो सर्जरी जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि यहां एक छोटी सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है।
पूर्व चिकित्सा शिक्षा अधिकारियों का भी मानना है कि प्रवेश के लिए न्यूनतम मानक बनाए रखना अनिवार्य है। उनके अनुसार, कटऑफ को जीरो परसेंटाइल तक गिराने से चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ेगा और यह व्यवस्था धीरे-धीरे योग्यता की जगह केवल सीट भरने का माध्यम बन सकती है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने की जल्दबाजी में क्या हम चिकित्सा तंत्र की बुनियादी गुणवत्ता से समझौता कर रहे हैं।