महाराष्ट्र में नगर निगम चुनाव के चलते 15 जनवरी को शेयर बाजार पूरी तरह ठप रहा। राज्य में मतदान को देखते हुए Bombay Stock Exchange और National Stock Exchange ने ट्रेडिंग हॉलिडे घोषित कर दी, जिसके चलते इक्विटी, डेरिवेटिव और करेंसी सेगमेंट में पूरे दिन कोई कारोबार नहीं हो सका। हालांकि इस फैसले ने बाजार के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि देश के सबसे बड़े ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म Zerodha के को-फाउंडर Nithin Kamath ने इसे सीधे तौर पर खराब प्लानिंग करार दिया है।
दरअसल, शुरुआत में एक्सचेंजों ने इस दिन को सिर्फ सेटलमेंट हॉलिडे रखा था, यानी ट्रेडिंग जारी रहती लेकिन शेयर और पैसों की डिलीवरी नहीं होती। बाद में बैंकों की छुट्टी का हवाला देते हुए पूरा ट्रेडिंग डे ही रद्द कर दिया गया। यहीं से सवाल खड़े हुए कि जब बाजार तकनीक और ऑटोमेशन के दौर में है, तो एक राज्य के लोकल चुनाव के कारण नेशनल मार्केट को पूरी तरह बंद करना कितना व्यावहारिक है।
नितिन कामथ ने खुलकर कहा कि भारत का शेयर बाजार अब पूरी तरह ग्लोबल इकोसिस्टम से जुड़ा हुआ है। ऐसे में किसी स्थानीय निकाय चुनाव के लिए पूरे देश का मार्केट बंद करना अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को गलत संदेश देता है। उन्होंने इस सोच पर तंज कसते हुए दिग्गज निवेशक वॉरेन बफे के लंबे समय तक सहयोगी रहे Charlie Munger का मशहूर कथन उद्धृत किया— “मुझे इंसेंटिव दिखाओ और मैं तुम्हें आउटकम दिखा दूंगा।” उनका इशारा साफ था कि सिस्टम में बदलाव की इच्छा ही नहीं है, इसलिए पुरानी परंपराएं बिना सवाल के चलती रहती हैं।
मार्केट एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि भारत जब खुद को ग्लोबल फाइनेंशियल पावर के तौर पर स्थापित करना चाहता है, तब बार-बार लोकल छुट्टियों की वजह से बाजार बंद रहना विदेशी फंड हाउसों के लिए परेशानी खड़ी करता है। हेजिंग, आर्बिट्राज और इंटरनेशनल टाइम जोन के साथ ट्रेडिंग करने वालों को ऐसे फैसलों से नुकसान होता है। हालांकि नियामक Securities and Exchange Board of India और सरकार की दलील रहती है कि चुनाव के दिन कर्मचारियों और मतदाताओं की सुविधा सर्वोपरि है।
पूरे दिन शेयर बाजार बंद रहने के बावजूद कमोडिटी ट्रेडर्स को आंशिक राहत मिली। Multi Commodity Exchange पर सुबह का सत्र बंद रहा, लेकिन शाम को गोल्ड, सिल्वर और कुछ अन्य कमोडिटीज में ट्रेडिंग शुरू हुई। एग्री-कमोडिटीज में रात 9 बजे तक कारोबार की अनुमति दी गई, जिससे कमोडिटी बाजार पूरी तरह ठप नहीं हुआ।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि क्या भारत को ग्लोबल फाइनेंशियल स्टैंडर्ड के मुताबिक अपने मार्केट कैलेंडर को री-डिजाइन करना चाहिए। लोकल चुनाव लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन क्या उनके लिए नेशनल मार्केट को बंद करना अब भी जरूरी है—इस पर बहस फिलहाल खत्म होती नजर नहीं आ रही।