भारत में नवंबर 2025 से लागू हुए नए लेबर कोड ने आईटी सेक्टर की आर्थिक गणित को झकझोर कर रख दिया है। जिस बदलाव को लंबे समय से श्रमिक हितों से जोड़कर देखा जा रहा था, उसका असर अब देश की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के तिमाही नतीजों में साफ नजर आने लगा है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इंफोसिस और एचसीएल टेक जैसी दिग्गज कंपनियों को कर्मचारियों से जुड़ी लागत में अचानक आई बढ़ोतरी का सामना करना पड़ा है। दिसंबर 2025 को समाप्त तिमाही में इसका सीधा असर मुनाफे और ऑपरेटिंग मार्जिन पर दिखा, जहां तीनों कंपनियों ने मिलकर 4,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की अतिरिक्त देनदारी दर्ज की।
असल में नए लेबर कोड ने सैलरी स्ट्रक्चर की परिभाषा ही बदल दी है। अब बेसिक वेतन का हिस्सा पहले की तुलना में बड़ा माना जा रहा है, जिससे ग्रेच्युटी, प्रोविडेंट फंड और अवकाश के बदले भुगतान जैसी वैधानिक जिम्मेदारियां स्वतः बढ़ गई हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा झटका कंपनियों को तब लगा, जब उन्हें अपने मौजूदा कर्मचारियों की पिछली सेवा अवधि के लिए भी अतिरिक्त प्रावधान करना पड़ा। इसी एकमुश्त खर्च को पास्ट सर्विस कॉस्ट कहा जाता है, जिसने बैलेंस शीट पर भारी दबाव पैदा किया।
आंकड़े इस असर की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। इंफोसिस को करीब 1,289 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा, वहीं टीसीएस पर यह बोझ 2,128 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। एचसीएल टेक के लिए यह आंकड़ा लगभग 956 करोड़ रुपये रहा। इन तीनों कंपनियों ने इस राशि को अपने वित्तीय नतीजों में एक्सेप्शनल चार्ज के रूप में दिखाया है, जिससे निवेशकों को यह संकेत मिल सके कि यह सामान्य परिचालन खर्च से अलग, एक असाधारण प्रभाव है।
हालांकि कंपनियों का तर्क है कि यह असर मुख्य रूप से एक बार का है। प्रबंधन का कहना है कि आगे चलकर हर साल मार्जिन पर इसका प्रभाव सीमित रहेगा और अनुमान के मुताबिक यह 10 से 20 बेसिस पॉइंट्स के दायरे में ही सिमट जाएगा। यानी शुरुआती झटके के बाद सिस्टम धीरे-धीरे इस नई व्यवस्था के अनुरूप खुद को ढाल लेगा।
लेकिन इस बदलाव को सिर्फ कंपनियों के नुकसान के चश्मे से देखना अधूरा विश्लेषण होगा। नए लेबर कोड का मूल उद्देश्य कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना है। अब फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को भी स्थायी कर्मचारियों की तरह पीएफ, ग्रेच्युटी, लीव और अन्य वैधानिक लाभ मिलेंगे। अपॉइंटमेंट लेटर को अनिवार्य करना और काम के घंटों को लेकर स्पष्ट नियम तय करना कार्यसंस्कृति को ज्यादा पारदर्शी और संगठित बनाता है। इससे आईटी सेक्टर में नौकरी की स्थिरता और कर्मचारियों का भरोसा बढ़ने की संभावना है।
कुल मिलाकर, अल्पकाल में जहां नए लेबर कोड ने आईटी कंपनियों की लागत बढ़ाकर उनके मुनाफे पर दबाव डाला है, वहीं लंबी अवधि में यह बदलाव एक ज्यादा संतुलित, सुरक्षित और नियमबद्ध कार्यसंस्कृति की ओर बढ़ता कदम माना जा रहा है। उद्योग और कर्मचारी—दोनों के लिए यह दौर एडजस्टमेंट का है, जिसके असली फायदे आने वाले वर्षों में और साफ दिखाई दे सकते हैं।