ग्रीनलैंड को लेकर वैश्विक राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। अमेरिका और डेनमार्क के बीच बढ़ते तनाव के बीच नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड यानी NORAD ने ग्रीनलैंड के रणनीतिक Pituffik Space Base पर एक विशेष विमान तैनात करने का ऐलान किया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका के नियंत्रण में लाने की अपनी मंशा खुलकर जाहिर कर चुके हैं।
NORAD के आधिकारिक बयान में कहा गया है कि यह तैनाती किसी अचानक लिए गए फैसले का नतीजा नहीं है, बल्कि अमेरिका, कनाडा और डेनमार्क के बीच लंबे समय से चली आ रही रक्षा साझेदारी और पूर्व-निर्धारित सैन्य गतिविधियों का हिस्सा है। संगठन ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड प्रशासन और डेनमार्क सरकार को इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी है और उनकी सहमति से ही यह कदम उठाया गया है। बावजूद इसके, अंतरराष्ट्रीय हलकों में इसे केवल एक नियमित सैन्य गतिविधि मानने के बजाय, बदलते भू-राजनीतिक संकेतों के रूप में देखा जा रहा है।
आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य और कूटनीतिक हलचल पहले ही तेज हो चुकी है। डेनमार्क की अगुवाई में हाल ही में शुरू हुए एक बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड और नीदरलैंड्स जैसे यूरोपीय देशों की भागीदारी ने इस क्षेत्र के बढ़ते सामरिक महत्व को और रेखांकित कर दिया है। दिलचस्प यह है कि इसी अभ्यास में अमेरिका को भी आमंत्रित किया गया था, जिससे यह संकेत मिलता है कि सहयोग और टकराव—दोनों ही एक साथ चल रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में राष्ट्रपति ट्रंप का आक्रामक रुख है। उन्होंने साफ संकेत दिए हैं कि यदि डेनमार्क और यूरोपीय देश ग्रीनलैंड को लेकर बातचीत के लिए आगे नहीं आते, तो अमेरिका कड़े आर्थिक कदम उठा सकता है। ट्रंप ने फरवरी 2026 से 10 प्रतिशत और जून 2026 से 25 प्रतिशत तक आयात शुल्क बढ़ाने की चेतावनी दी है। उनका तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है, क्योंकि आर्कटिक क्षेत्र में चीन और रूस की गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं।
ट्रंप का कहना है कि दशकों तक अमेरिका ने यूरोप की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाई है और अब समय आ गया है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड को लेकर “सही और व्यावहारिक फैसला” करे। इस बयान के बाद यूरोपीय राजधानियों में बेचैनी साफ देखी जा रही है। ग्रीनलैंड, जो कभी बर्फ और खामोशी का प्रतीक माना जाता था, अब एक बार फिर वैश्विक शक्ति संतुलन और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता दिख रहा है।