एशिया मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स 2026 में भारत छठे पायदान पर: चीन कायम नंबर-1, इंफ्रा और टैक्स सुधार भारत की अगली चुनौती

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एशिया के मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में खुद को स्थापित करने की भारत की कोशिशों को एशिया मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स 2026 में मिली रैंकिंग ने थोड़ा ठहराव दिखाया है। ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक 11 प्रमुख एशियाई देशों की सूची में भारत छठे स्थान पर है। दिलचस्प यह है कि 2024 की रिपोर्ट में भारत आठ देशों में चौथे नंबर पर था, लेकिन पिछले एक साल से वह छठे पायदान पर ही बना हुआ है। रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि अगर भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर और टैक्स सिस्टम में और गहरे सुधार करने होंगे।

इस इंडेक्स में चीन एक बार फिर एशिया का सबसे मजबूत मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन बनकर उभरा है और नंबर-1 पोजिशन पर कायम है। इस बार सबसे बड़ी छलांग मलेशिया ने लगाई है, जिसने वियतनाम को पीछे छोड़ते हुए दूसरा स्थान हासिल कर लिया। वियतनाम तीसरे, सिंगापुर चौथे और दक्षिण कोरिया पांचवें स्थान पर हैं, जबकि भारत इन सभी से पीछे छठे नंबर पर है। इंडोनेशिया सातवें और थाईलैंड आठवें पायदान पर मौजूद हैं।

यह रिपोर्ट Dezan Shira & Associates द्वारा जारी की गई है, जिसमें एशियाई देशों की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को आठ प्रमुख पैमानों पर परखा गया है। इनमें इकोनॉमी, पॉलिटिकल रिस्क, बिजनेस एनवायरनमेंट, इंटरनेशनल ट्रेड, टैक्स पॉलिसी, इंफ्रास्ट्रक्चर, लेबर फोर्स और एनवायरनमेंट-सोशल-गवर्नेंस यानी ESG जैसे फैक्टर शामिल हैं। इन्हीं मानकों के आधार पर यह तय किया गया कि कौन-सा देश निवेश और उत्पादन के लिहाज से कितना अनुकूल है।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल वर्कफोर्स और तेजी से बढ़ता घरेलू बाजार मानी गई है। सरकार की पीएलआई जैसी योजनाओं के चलते इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा सेक्टर में निवेश लगातार बढ़ रहा है, जिसने भारत को मैन्युफैक्चरिंग मैप पर मजबूती दी है। इसके बावजूद रिपोर्ट यह भी कहती है कि इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर भारत अभी सिंगापुर और चीन जैसे देशों से काफी पीछे है। लॉजिस्टिक्स लागत, टैक्स स्ट्रक्चर की जटिलता और संस्थागत स्थिरता को लेकर भी भारत को अपेक्षाकृत कम अंक मिले हैं।

रिपोर्ट में भ्रष्टाचार और राजनीतिक जोखिम को भी भारत के लिए चिंता का विषय बताया गया है। इन पैमानों पर भारत अपने छह प्रमुख प्रतिस्पर्धी देशों से पीछे रहा है, जबकि सिंगापुर को सबसे पारदर्शी और सुरक्षित मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन माना गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘मेक इन इंडिया’ को पूरी तरह सफल बनाने के लिए रेगुलेटरी प्रक्रियाओं को और सरल, तेज़ और अनुमानित बनाना होगा।

भविष्य की राह पर नजर डालें तो भारत का लक्ष्य वित्त वर्ष 2026 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी बनना है। रिपोर्ट का सुझाव है कि भारत को सिर्फ सस्ती लेबर की उपलब्धता पर निर्भर रहने के बजाय स्किल डेवलपमेंट, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स लागत घटाने पर फोकस बढ़ाना होगा। अगर यह सुधार जमीन पर उतरते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में आ सकता है।

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