ट्रेड बाजूका के आगे क्यों झुके ट्रम्प? यूरोप की एकजुटता ने दुनिया की ताकत का गणित बदल दिया

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दुनिया को टैरिफ की धमकियों से डराने वाले Donald Trump को आखिरकार यूरोप के सामने कदम पीछे खींचने पड़े। दावोस में यूरोपीय देशों का मज़ाक उड़ाने वाले ट्रम्प ने जब 1 फरवरी से 10% टैरिफ लगाने की चेतावनी दी, तो जवाब में European Union के 27 देशों ने एक साथ खड़े होकर जिस हथियार की धमकी दी, उसी ने वॉशिंगटन की सख्ती को नरमी में बदल दिया। इसे यूरोप ने नाम दिया—‘ट्रेड बाजूका’।

दावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने यूरोप को एक अहम सबक याद दिलाया—अगर देश अपनी सीमाओं, संप्रभुता और हितों की रक्षा के लिए एकजुट हो जाएं, तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी झुकाया जा सकता है। ट्रम्प की टैरिफ चेतावनी के जवाब में यूरोप ने साफ कर दिया कि वह भी पूरी ताकत से जवाबी आर्थिक कदम उठाने को तैयार है। नतीजा यह हुआ कि ट्रम्प ने न सिर्फ 10% टैरिफ से पीछे हटने का फैसला किया, बल्कि ग्रीनलैंड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी भाषा नरम कर ली।

दरअसल ‘ट्रेड बाजूका’ कोई प्रतीकात्मक शब्द नहीं, बल्कि EU का बेहद सख्त कानून है, जिसे आधिकारिक तौर पर एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट कहा जाता है। यह कानून यूरोप को यह अधिकार देता है कि अगर कोई देश टैरिफ, व्यापार या निवेश के जरिए दबाव बनाने की कोशिश करे, तो EU उसके खिलाफ सीधे आर्थिक वार कर सके। इसमें उस देश के सामान के इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट पर रोक, उसकी कंपनियों को यूरोपीय सरकारी टेंडर से बाहर करना और निवेश पर पाबंदी जैसे कदम शामिल हैं। 45 करोड़ उपभोक्ताओं वाला यूरोप अगर अपना बाजार बंद कर दे, तो सामने वाले देश की कंपनियों को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।

इस कानून की जड़ें चीन के साथ हुए एक पुराने टकराव में छिपी हैं। 2021 में जब लिथुआनिया ने ताइवान को प्रतिनिधि कार्यालय खोलने की अनुमति दी, तो चीन ने उस पर और EU से जुड़े सामानों पर व्यापारिक दबाव डाल दिया। इसी घटना से सबक लेकर यूरोप ने तय किया कि भविष्य में किसी भी बड़ी ताकत को आर्थिक ब्लैकमेल की इजाजत नहीं दी जाएगी। दिसंबर 2023 में एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट को अंतिम रूप दिया गया और अब वही कानून ट्रम्प के सामने ढाल बन गया।

यूरोप की यह सख्ती सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की बयानबाजी और वैश्विक ताकत संतुलन में बदलाव ने यूरोप को यह एहसास दिला दिया है कि उसे अब किसी एक देश पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। अमेरिका अब भी सैन्य और आर्थिक रूप से अहम है, लेकिन यूरोप के भीतर यह सोच मजबूत हो रही है कि रक्षा और रणनीति के मामलों में उसे खुद ज्यादा आत्मनिर्भर बनना होगा।

फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron से लेकर पोलैंड के प्रधानमंत्री Donald Tusk तक, कई नेताओं ने साफ कहा कि ‘अपिजमेंट’ यानी खुश करने की नीति अब काम नहीं करेगी। बेल्जियम के प्रधानमंत्री Bart De Wever का बयान—“गुलाम बनकर रहना मंजूर नहीं”—यूरोप के बदले मूड का सबसे साफ संकेत बन गया।

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष Ursula von der Leyen ने भी माना कि अमेरिका से निपटने में सख्ती, बातचीत, तैयारी और एकजुटता ही कारगर रही है। यही रणनीति आगे भी अपनाई जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस, चीन और अमेरिका तीनों मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अपने हिसाब से मोड़ना चाहते हैं और ऐसे में यूरोप के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी एकता और संप्रभुता बचाने की है।

कुल मिलाकर, ट्रम्प का पीछे हटना सिर्फ एक टैरिफ विवाद का अंत नहीं है, बल्कि यह उस नई वैश्विक हकीकत का संकेत है, जहां मिलकर खड़े होने वाले देश सबसे ताकतवर नेता को भी सोचने पर मजबूर कर सकते हैं।

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