बेडरूम CCTV विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: पत्नी के आरोप–पति के सबूत, अब फिर से होगा पूरा ट्रायल

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छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील वैवाहिक विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। पति-पत्नी के निजी जीवन से जुड़े आरोपों और डिजिटल सबूतों के बीच Chhattisgarh High Court ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए मामले की दोबारा सुनवाई के आदेश दिए हैं। मामला करीब छह साल पुराना है, जिसमें पत्नी ने पति पर बेडरूम में चोरी-छिपे CCTV कैमरा लगाकर निगरानी रखने और मारपीट का आरोप लगाया है, जबकि पति का दावा है कि पत्नी अन्य पुरुषों के साथ अश्लील चैटिंग और न्यूड वीडियो कॉल करती थी।

पूरा विवाद 2012 में हुई शादी के बाद शुरू हुआ। महासमुंद की रहने वाली महिला की शादी रायगढ़ निवासी टिकेश्वर पंडा से हुई थी, जो तमनार स्थित जिंदल पावर प्लांट में कार्यरत था। शादी के बाद पत्नी तमनार में पति के साथ रहने लगी। महिला का आरोप है कि वहां पहुंचने के बाद पति ने अतिरिक्त पैसों की मांग शुरू कर दी और मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न करने लगा। इसी दौरान उसने कथित तौर पर पत्नी की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बेडरूम में CCTV कैमरा लगवा दिया।

पत्नी के अनुसार, जब उसने कैमरे का विरोध किया तो मारपीट की गई और घर से निकालने की धमकी दी गई। नवंबर 2019 में दोनों परिवारों के बीच समझौते की कोशिश हुई, लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद पत्नी ने तमनार थाने में पति के खिलाफ उत्पीड़न और निगरानी से जुड़े आरोपों की शिकायत दर्ज कराई।

दूसरी तरफ, पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर करते हुए पत्नी पर क्रूरता और आपत्तिजनक आचरण का आरोप लगाया। उसने दावा किया कि पत्नी अन्य पुरुषों के साथ अश्लील बातचीत और न्यूड वीडियो कॉल करती थी और इसे साबित करने के लिए बेडरूम में लगे CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग CD के रूप में कोर्ट में पेश की। हालांकि महासमुंद फैमिली कोर्ट ने इन डिजिटल सबूतों को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B का प्रमाणपत्र न होने के आधार पर स्वीकार करने से इनकार कर दिया और पत्नी के पक्ष में दांपत्य अधिकारों की बहाली का आदेश दे दिया।

इस फैसले को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें Justice Sanjay K. Agrawal और Justice Arvind Kumar Verma शामिल थे, ने अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 14 और 20 के तहत फैमिली कोर्ट को यह अधिकार है कि वह विवाद के प्रभावी निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या साक्ष्य को स्वीकार कर सकती है, भले ही वह तकनीकी रूप से साक्ष्य अधिनियम की सभी शर्तें पूरी न करता हो।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया है और निर्देश दिया है कि CCTV फुटेज वाली CD को रिकॉर्ड पर लेकर उस पर जिरह की अनुमति दी जाए। साथ ही यह भी कहा गया है कि मामला चार साल से अधिक समय से लंबित है, इसलिए इसे प्राथमिकता के आधार पर जल्द निपटाया जाए। अब महासमुंद फैमिली कोर्ट इस पूरे मामले की नए सिरे से सुनवाई करेगी।

यह फैसला सिर्फ एक वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल सबूतों, निजता और फैमिली कोर्ट की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी संकेत भी देता है।

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