सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो का शोर जितना तेज़ है, उसके पीछे छुपा खेल उतना ही खतरनाक होता जा रहा है। पाकिस्तानी टिकटॉकर और इन्फ्लुएंसर अलीना आमिर का कथित 4 मिनट 40 सेकेंड का वीडियो इसी स्याह सच्चाई की एक और मिसाल बनकर सामने आया है। अलीना आमिर ने साफ शब्दों में इस वीडियो को डीपफेक बताते हुए कहा है कि यह उनकी छवि खराब करने के इरादे से तैयार किया गया है। उन्होंने पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज से मांग की है कि इस साइबर अपराध में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी और महिला को इस मानसिक उत्पीड़न से न गुजरना पड़े।
अलीना आमिर अकेली ऐसी सोशल मीडिया पर्सनैलिटी नहीं हैं जिन्हें फर्जी वीडियो के कारण सफाई देनी पड़ी हो। इससे पहले बांग्लादेशी अभिनेत्री आरोही मिम और भारतीय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वीट जन्नत के नाम पर भी इसी तरह के कथित “लीक वीडियो” फैलाए गए। बाद में इन सभी मामलों में यह साफ हुआ कि वीडियो पूरी तरह डीपफेक टेक्नोलॉजी से बनाए गए थे। इसके बावजूद सवाल यही बना रहा कि आखिर ये वीडियो कौन बना रहा है और इन्हें फैलाने का मकसद क्या है।
साइबर एक्सपर्ट्स और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पूरे खेल के पीछे सट्टेबाजी ऐप्स का बड़ा नेटवर्क सक्रिय है। तरीका लगभग एक जैसा होता है। पहले किसी जानी-पहचानी महिला इन्फ्लुएंसर या अभिनेत्री के नाम से डीपफेक वीडियो का हल्ला मचाया जाता है। फिर “वीडियो लिंक” के नाम पर टेलीग्राम, इंस्टाग्राम या X जैसे प्लेटफॉर्म्स पर पोस्ट डाले जाते हैं। यूज़र जैसे ही उस लिंक पर क्लिक करता है, वह असली वीडियो तक नहीं पहुंचता, बल्कि उसे किसी सट्टेबाजी ऐप, फर्जी वेबसाइट या मैलवेयर से संक्रमित वीडियो प्लेयर डाउनलोड करने के लिए रीडायरेक्ट कर दिया जाता है। जो लोग लालच या जिज्ञासा में आगे बढ़ते हैं, वही सीधे ठगी के जाल में फंस जाते हैं।
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों को खास तौर पर निशाना बनाए जाने की वजह भी साफ बताई जा रही है। इन देशों में मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल बहुत ज्यादा है और सेलिब्रिटीज़ की निजी ज़िंदगी को लेकर लोगों की उत्सुकता भी। ठग जानते हैं कि भले ही वीडियो के डीपफेक होने की आशंका हो, लेकिन बहुत से लोग सच्चाई परखने के बजाय उसे देखने की चाह में लिंक पर क्लिक कर ही देते हैं। यही कमजोरी जालसाजों के लिए कमाई का जरिया बन जाती है। चूंकि अधिकतर मामलों में शिकार महिलाएं होती हैं, इसलिए सामाजिक दबाव और बदनामी के डर से वे तुरंत सामने नहीं आ पातीं, और अपराधी इसी देरी का फायदा उठाते हैं। अलीना आमिर के मामले में भी यही देखने को मिला, जहां उन्होंने करीब एक हफ्ते बाद आकर पूरी सच्चाई बताई।
साइबर विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि चाहे वीडियो असली बताया जाए या डीपफेक, अगर कोई लिंक भेजकर “लीक क्लिप” दिखाने का दावा कर रहा है तो लगभग तय है कि वह स्कैमर है। ऐसे किसी भी लिंक पर क्लिक करना सीधे आर्थिक नुकसान और डिजिटल खतरे को न्योता देना है। साथ ही जिन लोगों को इस तरह निशाना बनाया जा रहा है, उनके लिए भी जरूरी है कि वे चुप न रहें, बल्कि समय रहते सामने आकर सच्चाई बताएं, ताकि दूसरों को इस जाल से बचाया जा सके।