Ayushman Yojana में सख्ती: 20 बेड पर 3 MBBS डॉक्टर अनिवार्य, नए नियमों से छोटे अस्पतालों में मचा हड़कंप

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आयुष्मान भारत योजना के तहत अस्पतालों के पंजीयन और इलाज व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार द्वारा लागू किए गए नए नियमों ने छोटे और मध्यम निजी अस्पतालों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। छत्तीसगढ़ में नए विभागीय पोर्टल Ayushman Bharat Yojana से जुड़े नियम सामने आने के बाद अस्पताल संचालकों में चिंता और असमंजस का माहौल है। नए प्रावधानों के तहत हर 20 बेड पर तीन एमबीबीएस डॉक्टरों की 24 घंटे तैनाती को अनिवार्य कर दिया गया है, जिसे कई अस्पताल अव्यवहारिक बता रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, आयुष्मान सहित अन्य शासकीय स्वास्थ्य योजनाओं को कसौटी पर परखने के लिए Health Empanelment Module 2.0 यानी हेम 2.0 पोर्टल के जरिए निजी अस्पतालों से विस्तृत जानकारी मांगी गई है। इसी पोर्टल में यह शर्त जोड़ी गई है कि 20 बेड के अस्पताल में तीन शिफ्ट के हिसाब से तीन एमबीबीएस डॉक्टरों की तैनाती जरूरी होगी। अस्पतालों का कहना है कि आय सीमित होने के कारण तीन एमबीबीएस डॉक्टरों का खर्च उठाना उनके लिए लगभग असंभव है। पहले बीएएमएस या अन्य पैथी के डॉक्टरों की मदद से काम चल जाता था, लेकिन नए नियमों में इसकी गुंजाइश खत्म हो गई है।

नियमों की सख्ती यहीं खत्म नहीं होती। नए पोर्टल में सर्जन, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ और अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों को अधिकतम तीन अस्पतालों से ही अटैच रहने की अनुमति दी गई है। इससे उन अस्पतालों पर सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है, जहां विशेषज्ञ डॉक्टर पार्ट टाइम सेवा देते थे। आशंका है कि कई जगह सर्जरी सेवाएं ठप हो सकती हैं और इसका सीधा नुकसान मरीजों को उठाना पड़ेगा।

निजी अस्पतालों को हेम 2.0 पोर्टल पर 31 जनवरी तक अपनी पूरी जानकारी अपलोड करना अनिवार्य किया गया है। इसी डेटा के आधार पर यह तय किया जाएगा कि कौन-सा अस्पताल आयुष्मान और अन्य सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के लिए पात्र रहेगा। सरकार का दावा है कि इससे अस्पतालों की मनमानी रुकेगी और मरीजों को बेहतर व पारदर्शी इलाज मिलेगा, लेकिन जमीनी स्तर पर अस्पताल संचालक इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान रहे हैं।

उधर, आयुष्मान योजना के तहत लंबित भुगतान का असर भी अब इलाज व्यवस्था पर दिखने लगा है। कई अस्पताल सीधे तौर पर मरीजों को मना तो नहीं कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अलग-अलग कारण बताकर कैश पेमेंट के लिए प्रेरित किया जा रहा है। करीब 600 करोड़ रुपये के बकाया भुगतान को लेकर Indian Medical Association समेत कई संगठनों ने पहले ही नाराजगी और चेतावनी जता दी है।

आईएमए हॉस्पिटल बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सुरेन्द्र शुक्ला का कहना है कि 20 बेड के अस्पताल में तीन एमबीबीएस डॉक्टरों की अनिवार्यता पूरी तरह अव्यवहारिक है। इस मुद्दे को लेकर शासन के सामने आपत्ति दर्ज कराई जा चुकी है। वहीं एएचपीआई के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता का मानना है कि नए नियमों से ऐसा प्रतीत होता है मानो योजना का दायरा जानबूझकर छोटा करने और छोटे अस्पतालों को बाहर करने की कोशिश की जा रही हो।

कुल मिलाकर, आयुष्मान योजना में पारदर्शिता लाने की मंशा के बीच नए नियमों ने छोटे और मध्यम अस्पतालों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन आपत्तियों पर क्या रुख अपनाती है।

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