Flexi-cap बनाम Multi-cap फंड: दिखते एक जैसे, खेल बिल्कुल अलग

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शेयर बाजार में थोड़ी भी सक्रियता रखने वाले निवेशक जानते हैं कि हर साल एक ही तरह के शेयर चमकते नहीं रहते। कभी लार्ज कैप कंपनियां स्थिरता देती हैं, तो कभी मिड कैप अचानक रफ्तार पकड़ लेती हैं और कई बार स्मॉल कैप जबरदस्त रिटर्न देने के बाद फिसल भी जाते हैं। यही अनिश्चितता निवेशकों को ऐसे फंड्स की ओर खींचती है, जो तीनों कैटेगरी में पैसा लगाते हैं। फ्लेक्सी-कैप और मल्टी-कैप फंड इसी सोच से बने हैं, लेकिन नाम मिलते-जुलते होने के बावजूद इनका स्वभाव और जोखिम पूरी तरह अलग है।

मार्केट कैप में बंटा हुआ निवेश इसलिए जरूरी माना जाता है क्योंकि किसी एक सेगमेंट पर दांव हमेशा सही नहीं बैठता। हाल के वर्षों को देखें तो तस्वीर साफ है। कहीं लार्ज कैप ने धीरे-धीरे भरोसेमंद रिटर्न दिए, तो कहीं मिड और स्मॉल कैप दबाव में रहे। कुछ साल पहले यही स्मॉल कैप बाकी दोनों से आगे निकल गए थे। कब कौन सा सेगमेंट आगे रहेगा, इसका सटीक अनुमान लगाना लगभग नामुमकिन है। ऐसे में तीनों में निवेश जोखिम को संतुलित करता है और लंबी अवधि में निवेशक को मानसिक सुकून भी देता है।

फ्लेक्सी-कैप फंड इसी आजादी के सिद्धांत पर चलते हैं। नियम बस इतना है कि कम से कम 65 प्रतिशत पैसा इक्विटी में लगा होना चाहिए। इसके बाद लार्ज, मिड और स्मॉल कैप के बीच कोई तय बंटवारा नहीं। पूरा खेल फंड मैनेजर की सोच, अनुभव और समय पर फैसलों पर निर्भर करता है। अगर उसे लगे कि लार्ज कैप इस समय सुरक्षित और आकर्षक हैं, तो वहीं ज्यादा निवेश होगा। अगर मिड या स्मॉल कैप में बेहतर मौके दिखें, तो फंड का रुख उधर मुड़ सकता है। यानी यहां निवेशक असल में फंड मैनेजर की समझ पर भरोसा करता है।

इसके उलट मल्टी-कैप फंड नियमों से बंधे होते हैं। इनमें कम से कम 75 प्रतिशत निवेश इक्विटी में करना होता है और उसमें भी हर हाल में लार्ज, मिड और स्मॉल कैप में 25-25 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखना जरूरी है। इसका फायदा यह है कि पोर्टफोलियो हर समय संतुलित रहता है और किसी एक सेगमेंट पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता नहीं बनती। लेकिन यही नियम कई बार कमजोरी भी बन जाता है। अगर स्मॉल कैप शेयर बहुत महंगे या जोखिम भरे हों, तब भी फंड वहां से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकता।

यही अंतर रिटर्न और जोखिम में भी दिखता है। फ्लेक्सी-कैप फंड तेजी के दौर या संभावित बुलबुले के समय जोखिम घटा सकता है, क्योंकि फंड मैनेजर एक्सपोजर बदल सकता है। लेकिन अगर उसका अनुमान गलत हुआ, तो रिटर्न औसत से पीछे भी रह सकते हैं। मल्टी-कैप फंड में उतार-चढ़ाव ज्यादा महसूस होता है, खासकर तब जब स्मॉल कैप में गिरावट आती है, क्योंकि वहां निवेश कम करने की गुंजाइश नहीं होती।

कई बार आंकड़ों में मल्टी-कैप फंड के औसत रिटर्न बेहतर नजर आते हैं, लेकिन यह किसी स्थायी नियम की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। असल में फर्क इस बात से पड़ता है कि फंड का प्रबंधन कितना मजबूत है और निवेशक खुद कितना जोखिम झेल सकता है।

आखिर सवाल वही है—आपके लिए कौन सही है? अगर आप फंड मैनेजर के फैसलों पर भरोसा रखते हैं और बाजार के उतार-चढ़ाव को सहने का धैर्य रखते हैं, तो फ्लेक्सी-कैप फंड आपकी सोच से मेल खा सकता है। वहीं अगर आप हर समय तय ढांचे में संतुलित निवेश चाहते हैं और नियम आधारित सिस्टम को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं, तो मल्टी-कैप फंड बेहतर विकल्प लगता है। इन दोनों के बीच असल मुकाबला नहीं, बल्कि निवेश के नजरिए का फर्क है। सही चुनाव वही है, जो आपकी जोखिम क्षमता और लंबे समय तक टिके रहने की ताकत से तालमेल बैठाए।

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