रिकॉर्ड ऊँचाइयों को छूने के बाद कीमती धातुओं ने अचानक ब्रेक लगा दिया। शुक्रवार की इस जोरदार फिसलन ने न सिर्फ सोना-चांदी की चमक फीकी की, बल्कि उनसे जुड़े गोल्ड और सिल्वर ETF निवेशकों की धड़कन भी बढ़ा दी। एक ही सत्र में गोल्ड ETF जहां 10–12 फीसदी तक लुढ़के, वहीं सिल्वर ETF में 22–24 फीसदी की बड़ी टूट देखने को मिली। सवाल वही पुराना है—क्या यह गिरावट खरीदारी का मौका है या अभी इंतज़ार समझदारी?
कमोडिटी एक्सचेंज पर तस्वीर और साफ दिखी। MCX पर अप्रैल एक्सपायरी वाला गोल्ड फ्यूचर्स करीब 9 फीसदी टूटकर 1,68,000 रुपये प्रति 10 ग्राम आ गया—जबकि एक दिन पहले ही यही भाव 1,93,096 रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर था। फरवरी और जून कॉन्ट्रैक्ट भी इसी रफ्तार से फिसले। चांदी की चाल और तीखी रही। मार्च एक्सपायरी सिल्वर फ्यूचर्स करीब 15 फीसदी गिरकर 3,39,910 रुपये प्रति किलो पर फिसल गया, जबकि मई और जुलाई कॉन्ट्रैक्ट 12 से 20 फीसदी नीचे रहे।
ETF बाजार में भी बिकवाली की आंधी चली। प्रमुख गोल्ड ETF दो अंकों की गिरावट के साथ दबाव में रहे, जबकि सिल्वर ETF में नुकसान और गहरा दिखा—कुछ फंड्स ने एक झटके में करीब एक-चौथाई वैल्यू गंवा दी। यानी तेजी का जोश जितना तेज था, करेक्शन उतना ही बेरहम साबित हुआ।
इस गिरावट की टाइमिंग भी मायने रखती है। अमेरिका में Federal Reserve के अगले चेयरमैन को लेकर बढ़ती अटकलों ने डॉलर को मजबूती दी और मुनाफावसूली को हवा मिली। ओवरबॉट ज़ोन में पहुंच चुकी कीमतों पर ट्रिगर मिलते ही बिकवाली तेज हो गई।
एक्सपर्ट्स का संदेश साफ लेकिन संतुलित है। लंबी तेजी के बाद एकमुश्त एंट्री जोखिम भरी हो सकती है। बेहतर रणनीति यही मानी जा रही है कि अगर निवेश करना है तो किस्तों में करें, उतार-चढ़ाव को अपने पक्ष में इस्तेमाल करें। लंबी अवधि के निवेशक इस करेक्शन को रणनीतिक अवसर की तरह देख सकते हैं, लेकिन शॉर्ट-टर्म सट्टेबाज़ी से दूरी रखना ही समझदारी है। वैश्विक अनिश्चितता, सेंट्रल बैंकों की लगातार खरीद और महंगाई से बचाव की जरूरत के बीच सोना अब भी पोर्टफोलियो में अपनी जगह बनाए रख सकता है—बस धैर्य और अनुशासन के साथ।