रायपुर के जंगल सफारी में एक और गंभीर मामला सामने आया है, जिसने वन्यजीव संरक्षण और प्रबंधन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सात साल पहले मोहरेंगा से रेस्क्यू कर लाए गए तेंदुए के केनाइन दांत गायब मिलने की बात उजागर हुई है। हैरानी की बात यह है कि सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगे जाने पर पहले सफारी प्रबंधन ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देकर विवरण देने से इनकार किया, और अपील के बाद दांत से जुड़ी किसी भी जानकारी के अस्तित्व से ही इंकार कर दिया।
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जू और सफारी में रहने वाले हर वन्यजीव की स्वास्थ्य स्थिति, उपचार, चोट और शरीर के किसी भी अंग में बदलाव का पूरा रिकॉर्ड अनिवार्य रूप से संधारित किया जाता है। नियम यह भी कहते हैं कि किसी वन्यजीव की मृत्यु के बाद उसकी पूरी केस हिस्ट्री सुरक्षित रखी जाए। ऐसे में एक तेंदुए जैसे संरक्षित वन्यजीव के केनाइन दांत की जानकारी का रिकॉर्ड में न होना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।
वन्यजीव प्रेमियों ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि केवल मोहरेंगा से रेस्क्यू किए गए तेंदुए तक ही सीमित न रहकर, जंगल सफारी में रखे गए सभी रेस्क्यू वन्यजीवों के रिकॉर्ड की व्यापक जांच होनी चाहिए। आशंका जताई जा रही है कि यदि इस मामले में रिकॉर्ड गायब है, तो अन्य जानवरों के दांत या शरीर के हिस्सों से जुड़ी जानकारी भी अधूरी या लापता हो सकती है। जू प्रबंधन में तो यहां तक नियम है कि किसी हिरण का सींग टूटकर गिर जाए, तो भी उसका उल्लेख रजिस्टर में किया जाता है—ऐसे में तेंदुए के केनाइन दांत का कोई रिकॉर्ड न होना चौंकाने वाला है।
इस पूरे प्रकरण पर जंगल सफारी के निदेशक तेजस शेखर ने कहा है कि वे फिलहाल बाहर हैं और रिकॉर्ड देखकर ही स्थिति स्पष्ट कर पाएंगे। वहीं, केंद्रीय जू प्राधिकरण (CZA) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, जू में रह रहे हर वन्यजीव का दैनिक स्वास्थ्य परीक्षण और विस्तृत स्वास्थ्य रजिस्टर अनिवार्य है, जिसमें दांत, नाखून या किसी भी अंग के टूटने-बदलने की प्रविष्टि दर्ज होनी चाहिए।
वन्यजीव संरक्षण के जानकारों का कहना है कि जंगलों में तेंदुए और बाघ का अवैध शिकार अक्सर उनके दांत, नाखून और खाल के लिए किया जाता है। ऐसे में केनाइन दांत जैसे अहम अंग का रिकॉर्ड से गायब होना केवल प्रशासनिक चूक नहीं माना जा सकता। अब मांग उठ रही है कि जंगल सफारी रायपुर के पूरे रिकॉर्ड का स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट कराया जाए, ताकि यह साफ हो सके कि यह मामला लापरवाही है या इसके पीछे कोई संगठित गड़बड़ी छिपी है।