रायपुर में सरकारी अस्पतालों में सप्लाई होने वाली कृमिनाशक दवा एल्बेंडाजोल के अमानक पाए जाने के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन द्वारा जारी शोकॉज नोटिस के जवाब में संबंधित फर्म ने निगम की जांच प्रक्रिया को ही चुनौती दे दी है और दवा को ब्लैकलिस्ट करने से पहले किसी अन्य मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में पुनः परीक्षण कराने की अनुमति मांगी है। अधिकारियों का साफ कहना है कि यदि दूसरी लैब की रिपोर्ट में भी सैंपल फेल होता है, तो काली सूची में डालने की प्रक्रिया बिना देरी पूरी की जाएगी।
स्वास्थ्य व्यवस्था में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर सख्ती के संकेत पहले ही मिल चुके हैं। हाल ही में कृमिनाशक टैबलेट के अमानक पाए जाने पर कंपनी से जवाब-तलब किया गया था और पूछा गया था कि उसे ब्लैकलिस्ट क्यों न किया जाए। अब फर्म ने अपने बचाव में जांच पर सवाल खड़े करते हुए वैकल्पिक लैब की मांग रख दी है। निगम के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि नियमों के तहत दूसरी जांच की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन परिणाम वही निकला तो कार्रवाई और कठोर होगी।
सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में दो कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की तैयारी लगभग तय मानी जा रही है। इन कंपनियों की तीन दवाएं पहले ही करीब तीन महीने पहले काली सूची में डाली जा चुकी थीं। इसके बाद एक अन्य उत्पाद के भी अमानक पाए जाने से मामला गंभीर हो गया। नियम स्पष्ट हैं—यदि किसी फर्म के दो उत्पाद ब्लैकलिस्ट होते हैं, तो फर्म के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। दोनों कंपनियां अन्य राज्यों से संबंधित बताई जा रही हैं, जिससे अंतरराज्यीय सप्लाई चेन की निगरानी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
इसी बीच दवा निगम ने सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में उपलब्ध दवाओं की सूची बढ़ाने की तैयारी भी तेज कर दी है। मांग में रहने वाली 101 नई दवाओं की खरीदी के लिए बड़े स्तर पर टेंडर जारी किए गए हैं और जल्द ही सप्लाई के वर्कऑर्डर जारी होने की संभावना है। इसके साथ ही अस्पतालों में सुविधाओं के विस्तार के लिए आवश्यक उपकरणों की खरीद की प्रक्रिया भी निगम में लंबित है, जिसे जल्द निपटाने की योजना बनाई जा रही है।
कुल मिलाकर, एल्बेंडाजोल प्रकरण ने एक बार फिर सरकारी दवा आपूर्ति की गुणवत्ता और जवाबदेही को केंद्र में ला दिया है। अब निगाहें दूसरी लैब की रिपोर्ट और उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं, क्योंकि दवाओं की शुद्धता से सीधे मरीजों की सेहत जुड़ी है और यहां किसी तरह की ढिलाई की गुंजाइश नहीं छोड़ी जा सकती।