आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तेज़ रफ्तार अब आम उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर डालने वाली है। स्मार्टफोन, टीवी, कंप्यूटर और दूसरे कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स आने वाले महीनों में काफी महंगे हो सकते हैं। वजह है—एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बढ़ती चिप्स की मांग और उसी अनुपात में घटती कंज्यूमर-ग्रेड चिप्स की सप्लाई। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि हालात ऐसे बने तो इन डिवाइसेज़ की कीमतें 50% तक बढ़ सकती हैं।
काउंटरपॉइंट रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि एआई के लिए बन रहे डेटा सेंटर्स और हाई-परफॉर्मेंस सर्वर्स को बड़ी मात्रा में मेमोरी चिप्स चाहिए। इसी वजह से मेमोरी चिप बनाने वाली कंपनियां अब आम मोबाइल और टीवी में इस्तेमाल होने वाली चिप्स की जगह हाई-बैंडविड्थ मेमोरी और सर्वर-ग्रेड डीआरएएम पर फोकस कर रही हैं, क्योंकि वहां मुनाफा कहीं ज़्यादा है। नतीजा यह हुआ है कि कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चिप्स की उपलब्धता तेजी से घट रही है।
सैमसंग, एसके हाइनिक्स और माइक्रॉन जैसे बड़े सप्लायर्स एआई और सर्वर क्लाइंट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऑर्डर कंट्रोल सख्त कर दिए गए हैं और स्टॉकिंग पर रोक लगा दी गई है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि आम बाजार के लिए मेमोरी चिप्स की कमी पैदा हो गई है।
स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मेमोरी चिप्स के दाम पहले ही 300 से 400 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। स्मार्ट टीवी में इस्तेमाल होने वाली DDR-3 और DDR-4 मेमोरी अब सर्वर सेक्टर की ओर डायवर्ट हो रही है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि मार्च तक चिप्स की कीमतें और 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं, जिसका असर सीधे टीवी और स्मार्टफोन की कीमतों पर दिखेगा। अनुमान है कि सिर्फ इसी साल टीवी के दाम 7 से 10 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं।
फोन मार्केट में भी दबाव साफ दिख रहा है। कुछ ब्रांड्स ने कीमतें बढ़ाने के संकेत दे दिए हैं। हालांकि एपल को लेकर माना जा रहा है कि वह फिलहाल कीमतें स्थिर रखने की कोशिश करेगा, क्योंकि वह ग्लोबल मेमोरी सप्लाई का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल करता है और सप्लायर्स पर दबाव बना सकता है। लेकिन बाकी ब्रांड्स के लिए यह रास्ता आसान नहीं होगा।
कंप्यूटर और लैपटॉप सेक्टर में भी हलचल तेज हो गई है। कुछ ग्लोबल ब्रांड्स अब पारंपरिक सप्लायर्स के बजाय चीन की कंपनियों से मेमोरी चिप्स लेने के विकल्प तलाश रहे हैं, ताकि लागत को काबू में रखा जा सके। अगर ऐसा होता है, तो लैपटॉप और पीसी की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी कुछ हद तक टल सकती है।
बढ़ती कीमतों का असर उपभोक्ताओं की पसंद पर भी पड़ सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि लोग अब बड़ी स्क्रीन वाले टीवी से छोटे साइज की ओर शिफ्ट कर सकते हैं। 65 इंच की जगह 55 इंच और 55 इंच की जगह 43-50 इंच टीवी लेने का ट्रेंड बढ़ सकता है। यानी बड़े स्क्रीन का दौर फिलहाल थमता दिख रहा है।
इस चिप संकट की मार सिर्फ मोबाइल और टीवी तक सीमित नहीं है। ग्राफिक्स कार्ड, गेमिंग चिप्स और यहां तक कि ऑटोमोबाइल सेक्टर भी इससे प्रभावित हो रहा है, क्योंकि आधुनिक गाड़ियों में भी भारी मात्रा में सेमीकंडक्टर्स और मेमोरी चिप्स की जरूरत होती है। कुल मिलाकर, एआई की बढ़ती ताकत टेक्नोलॉजी को आगे तो ले जा रही है, लेकिन उसकी कीमत अब आम उपभोक्ता को चुकानी पड़ सकती है।