घर खरीदना हर परिवार का बड़ा सपना होता है, लेकिन इस सपने की असली कीमत अक्सर विज्ञापन में लिखी बेस प्राइस से कहीं ज्यादा होती है। मान लीजिए किसी प्रोजेक्ट में फ्लैट की कीमत 1.5 करोड़ रुपये बताई गई है। कागज पर यह रकम साफ और तय नजर आती है, लेकिन रजिस्ट्रेशन से लेकर पजेशन तक पहुंचते-पहुंचते खर्च लाखों रुपये बढ़ चुका होता है। यह कोई धोखा नहीं, बल्कि वे अतिरिक्त लागतें हैं जिनका अंदाजा पहले नहीं लगाया जाता।
सबसे पहले बात स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन की। अलग-अलग राज्यों में यह प्रॉपर्टी वैल्यू का लगभग 5 से 8 फीसदी या उससे ज्यादा भी हो सकता है। यानी 1.5 करोड़ के फ्लैट पर करीब 7 से 12 लाख रुपये अलग से चुकाने पड़ सकते हैं। यह रकम आमतौर पर एकमुश्त देनी होती है और कई खरीदार अपनी फाइनेंशियल प्लानिंग में इसे शामिल करना भूल जाते हैं।
अगर फ्लैट अंडर-कंस्ट्रक्शन है तो उस पर जीएसटी भी देना पड़ता है, जो आमतौर पर 5 फीसदी तक हो सकता है। वहीं कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिल चुका रेडी-टू-मूव फ्लैट जीएसटी से मुक्त होता है। यही अंतर कई बार खरीदारी का फैसला बदल देता है, क्योंकि टैक्स की रकम लाखों में पहुंच सकती है।
पजेशन के समय असली सरप्राइज सामने आता है। डेवलपर एक या दो साल का एडवांस मेंटेनेंस, कॉर्पस फंड, क्लब हाउस चार्ज, बिजली मीटर इंस्टॉलेशन, पानी कनेक्शन और अन्य सुविधाओं के नाम पर अलग-अलग रकम मांग सकता है। हर चार्ज अलग से छोटा लगे, लेकिन कुल मिलाकर यह आंकड़ा लाखों तक पहुंच जाता है। इसके अलावा कार पार्किंग, प्रीमियम फ्लोर, कॉर्नर यूनिट या बेहतर व्यू के नाम पर भी अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है।
होम लोन लेने पर भी खर्च की कहानी खत्म नहीं होती। बैंक प्रोसेसिंग फीस, लीगल और टेक्निकल वैल्यूएशन चार्ज, अनिवार्य इंश्योरेंस पॉलिसी जैसी लागतें जुड़ती रहती हैं। सबसे बड़ा दीर्घकालिक बोझ ब्याज का होता है। उदाहरण के तौर पर अगर 1 करोड़ रुपये का लोन 8.5 फीसदी ब्याज पर लंबे समय के लिए लिया जाए, तो कुल चुकाया गया ब्याज लगभग मूल रकम के बराबर पहुंच सकता है। यानी घर की कीमत कागज पर कुछ और, और असल में कुछ और।
घर मिलने के बाद भी खर्च रुकता नहीं। इंटीरियर, मॉड्यूलर किचन, वार्डरोब, लाइटिंग और फॉल्स सीलिंग जैसे कामों पर 5 से 15 लाख रुपये तक खर्च हो सकता है। शिफ्ट होने के बाद हर महीने मेंटेनेंस, प्रॉपर्टी टैक्स और सोसायटी चार्ज अलग से जुड़ते रहते हैं।
यही वजह है कि फ्लैट खरीदते समय केवल बेस प्राइस पर भरोसा करना समझदारी नहीं। पूरी कॉस्ट शीट मांगना, हर चार्ज को समझना और कुल बजट में कम से कम 5 से 10 फीसदी अतिरिक्त बफर रखना जरूरी है। घर का सपना तभी सुकून देता है, जब उसकी असली कीमत का अंदाजा पहले से हो और वित्तीय योजना मजबूत हो।