महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर राजनाथ सिंह ने भारतीय सेना की कार्यशैली को भगवान शिव की प्रतीकात्मक शक्ति से जोड़ते हुए एक गहरा संदेश दिया। ईशा फाउंडेशन के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारतीय सेनाएं शिव की तरह ही संतुलन का प्रतीक हैं—एक ओर करुणा और मानवता, तो दूसरी ओर आवश्यकता पड़ने पर रौद्र और निर्णायक कार्रवाई।
रक्षामंत्री ने कहा कि जैसे भगवान शिव सृजन और संहार दोनों के देवता माने जाते हैं, वैसे ही भारतीय सेना भी शांति के समय मानवीय सहायता और आपदा राहत में आगे रहती है, लेकिन जब देश की सुरक्षा की बात आती है तो वही सेना रुद्र रूप धारण कर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे अभियानों को अंजाम देती है। उनके अनुसार, यह संतुलन ही भारत की रक्षा शक्ति की असली पहचान है।
अपने संबोधन में उन्होंने भारत की वैज्ञानिक प्रगति को भी आध्यात्मिक विरासत से जोड़ा। ISRO के मिशन चंद्रयान-3 और आदित्य-L1 का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये केवल आधुनिक तकनीकी उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक सोच का आधुनिक विस्तार हैं। जिस तरह आज भारत अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेज रहा है, उसी तरह वह अपनी वैज्ञानिक संस्कृति को भी नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है।
राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल हथियारों, टेक्नोलॉजी या सैनिकों की शारीरिक क्षमता तक सीमित नहीं है। असली सुरक्षा एक मजबूत राष्ट्रीय सोच से आती है। डर और असुरक्षा की भावना पर आधारित समाज लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। उन्होंने काशी और तमिलनाडु के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
कार्यक्रम में सद्गुरु जग्गी वासुदेव के साथ मिलकर रक्षामंत्री ने कई विशिष्ट हस्तियों को सम्मानित भी किया। ‘भव्य भारत भूषण अवॉर्ड’ के तहत वेस्टर्न एयर कमांड के एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा और वेस्टर्न नेवल कमांड के एडमिरल राहुल विकास खोकले को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में उनके योगदान के लिए सम्मान दिया गया।
इसके अलावा कला, विज्ञान और खेल जगत की प्रमुख हस्तियों को भी सम्मानित किया गया। इनमें रॉकेट वैज्ञानिक नांबी नारायणन, इसरो के पूर्व चेयरमैन ए.एस. किरण कुमार और बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल जैसे नाम शामिल रहे।
राजनाथ सिंह ने अंत में कहा कि वे तमिलनाडु की पवित्र धरती पर मेहमान बनकर नहीं, बल्कि एक साधक के रूप में आए हैं। उनके शब्दों में, भारतीय सेना की शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता में नहीं, बल्कि उसके आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों में भी निहित है। यही कारण है कि भारत की सेनाएं जरूरत पड़ने पर मदद का हाथ भी बढ़ाती हैं और देश की रक्षा के लिए कठोर कदम भी उठाती हैं।