नीट पीजी मॉपअप राउंड पर सवाल: 14 अंकों में मिली पीजी सीट, गुणवत्ता बनाम सीट भरने की बहस तेज

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नीट पीजी काउंसलिंग के मॉपअप राउंड के नतीजों ने चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। 600 में सिर्फ 14 अंक हासिल करने वाले एक अभ्यर्थी को एनेस्थीसिया विषय में पीजी सीट आवंटित होने के बाद कटऑफ, आरक्षण नीति और मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार संबंधित उम्मीदवार की ऑल इंडिया रैंक 2,29,790 रही, जबकि राज्य स्तर पर उसकी रैंक 5,340 बताई गई। सामान्य परिस्थितियों में इतने कम अंकों के साथ काउंसलिंग में शामिल होना भी मुश्किल माना जाता है। यही वजह रही कि वह पहले और दूसरे राउंड में हिस्सा नहीं ले पाया। हालांकि बाद में चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा न्यूनतम कटऑफ में कमी किए जाने के बाद उसे पात्रता मिली और मॉपअप राउंड में सीट आवंटित हो गई।

बताया जा रहा है कि अभ्यर्थी आरक्षित वर्ग से संबंधित है। नियमों के अनुसार कटऑफ में ढील दिए जाने के बाद उसे काउंसलिंग में भाग लेने का अवसर मिला। मॉपअप राउंड में सीटों की उपलब्धता और घटे हुए कटऑफ का सीधा लाभ उसे मिला। इस राउंड में कुल 1461 सीटों का आवंटन किया गया, जिनमें से 924 सीटें नए अभ्यर्थियों को दी गईं। इन्हीं में यह मामला सामने आया और चर्चा का केंद्र बन गया।

मेडिकल छात्रों के राष्ट्रीय संगठन फाइमा से जुड़े डॉ. आकाश सोनी ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने के प्रयास में गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए। यदि सामान्य मानकों पर पात्र न ठहरने वाले उम्मीदवार भी ढील के आधार पर सीट प्राप्त कर लेते हैं, तो इससे भविष्य में चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, यह भी तथ्य है कि पूरी प्रक्रिया नियमों और आरक्षण नीति के दायरे में ही संपन्न हुई है।

मॉपअप राउंड दरअसल काउंसलिंग प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है। जब पहले और दूसरे राउंड के बाद भी सीटें खाली रह जाती हैं—चाहे किसी ने प्रवेश न लिया हो, रिपोर्ट न किया हो या सीट छोड़ दी हो—तो बची हुई सीटों को भरने के लिए यह राउंड आयोजित किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई सीट खाली न रह जाए। कई बार इस चरण में सीटें भरने के लिए कटऑफ में ढील भी दी जाती है, ताकि उपलब्ध सीटों का अधिकतम उपयोग हो सके।

मॉपअप राउंड को आमतौर पर सीट पाने का आखिरी अवसर माना जाता है। इसमें वही अभ्यर्थी भाग ले सकते हैं, जो संशोधित पात्रता मानदंड पूरा करते हों। इस राउंड में सीट मिलने के बाद उसे छोड़ने या अपग्रेड का विकल्प प्रायः उपलब्ध नहीं होता। यही कारण है कि इस चरण के फैसले कई बार व्यापक चर्चा और विवाद का विषय बन जाते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है—क्या मेडिकल सीटों को खाली रहने से बचाने के लिए कटऑफ में ढील देना व्यावहारिक आवश्यकता है, या इससे गुणवत्ता पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है? एक ओर डॉक्टरों की कमी का तर्क है, तो दूसरी ओर चिकित्सा प्रशिक्षण की उच्च गुणवत्ता बनाए रखने की चुनौती।

नीट पीजी मॉपअप राउंड का यह मामला अब केवल एक सीट आवंटन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रवेश प्रक्रिया, नीति निर्माण और मेडिकल शिक्षा के मानकों पर व्यापक विमर्श का कारण बन गया है।

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