गुरुवार को देशभर में Chhatrapati Shivaji Maharaj की जयंती श्रद्धा और गर्व के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर इतिहास का वह महत्वपूर्ण प्रसंग फिर याद किया जा रहा है, जब अप्रैल 1666 में आगरा की ओर जाते हुए शिवाजी महाराज ने संभाजीनगर (तत्कालीन औरंगाबाद) में पड़ाव डाला था। उस समय उनकी बढ़ती प्रतिष्ठा और प्रभाव का ऐसा असर था कि उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।
आज का छत्रपति संभाजीनगर, जिसे कभी मुगल दक्कन की राजधानी के रूप में जाना जाता था, उस दौर में हिंदवी स्वराज्य का हिस्सा नहीं था। फिर भी जब शिवाजी महाराज यहां पहुंचे, तो शहर में उत्सुकता और सम्मान का अनोखा माहौल देखने को मिला। उस समय यह नगर मुगल सम्राट Aurangzeb के नाम पर औरंगाबाद कहलाता था।
इस ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख मुगल प्रशासनिक अधिकारी भीमसेन सक्सेना ने अपनी आत्मकथा ‘तारीख-ए-दिलकुशा’ में किया है। बाद में प्रसिद्ध इतिहासकार Jadunath Sarkar ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया। इन संस्मरणों में शिवाजी महाराज के प्रभावशाली व्यक्तित्व, उनके अनुशासित घुड़सवार दल और उन्हें मिले जनसमर्थन का विस्तार से वर्णन मिलता है।
यह यात्रा पुरंदर की संधि के बाद हुई थी, जो मुगल सूबेदार Mirza Raja Jai Singh I के साथ संपन्न हुई थी। इसी समझौते के तहत शिवाजी महाराज को आगरा जाकर औरंगजेब से भेंट करनी थी। आगरा की ओर जाते हुए अप्रैल 1666 में वे संभाजीनगर में रुके। उनके साथ लगभग 500 सुसज्जित और सशस्त्र सैनिक थे। उनके काफिले में सोने-चांदी से सजी पालकी, दो हाथी, सामान ढोने वाले ऊंट और केसरिया-भगवा ध्वज शामिल था, जो स्वराज्य की पहचान बन चुका था।
वर्णनों के अनुसार, शिवाजी महाराज का व्यक्तित्व दुबला-पतला, गोरे रंग का और अत्यंत प्रभावशाली बताया गया है। उनके साथ उनके नौ वर्षीय पुत्र Sambhaji Maharaj भी थे, जिनकी उपस्थिति ने लोगों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।
यात्रा के दौरान एक रोचक प्रसंग भी सामने आया। मुगल अधिकारी सैफ शिकन खान स्वयं स्वागत के लिए उपस्थित नहीं हुए और उन्होंने अपने भतीजे को भेज दिया। यह बात शिवाजी महाराज को नागवार गुजरी। जब भतीजे ने बताया कि खान दरबार में उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो शिवाजी महाराज ने तीखे शब्दों में पूछा कि वह स्वयं मिलने क्यों नहीं आए। बाद में खान और अन्य अधिकारियों ने औपचारिक भेंट की और अगले दिन शिवाजी महाराज ने उनके निवास पर जाकर मुलाकात की, जहां उन्हें उनके पद के अनुरूप सम्मान दिया गया।
संभाजीनगर का यह पड़ाव केवल एक यात्रा का हिस्सा नहीं था, बल्कि उस दौर में शिवाजी महाराज की बढ़ती शक्ति और जनसमर्थन का प्रतीक भी था। इसके बाद वे आगरा के लिए रवाना हुए—एक ऐसी यात्रा, जिसने आगे चलकर भारतीय इतिहास की दिशा पर गहरा प्रभाव डाला।
आज जयंती के अवसर पर यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि नेतृत्व केवल तलवार की ताकत से नहीं, बल्कि जनविश्वास और सम्मान से भी स्थापित होता है।