बिजली कंपनी ने दिया 24% वृद्धि का प्रस्ताव:आयोग का मिड-वे मॉडल, इससे बिजली की दरों में 5-7% तक ही बढ़ोतरी होने के आसार…!!

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विधानसभा सत्र शुरू होने से ठीक पहले प्रदेश में बिजली दरों में वृद्धि को लेकर हलचल तेज हो गई है। राज्य की बिजली वितरण कंपनी ने वर्ष 2026-27 के लिए करीब 6000 करोड़ रुपए के राजस्व घाटे का हवाला देते हुए 24 प्रतिशत तक दर वृद्धि का प्रस्ताव दिया है। हाल ही में पूरी हुई जनसुनवाई में उपभोक्ता संगठनों और उद्योग प्रतिनिधियों ने इसका विरोध किया। इसे देखते हुए विद्युत विनियामक आयोग दरों में वृद्धि को लेकर ‘मिड-वे मॉडल’ पर विचार रहा है। इससे दरों में 5 से 7 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने के आसार जताए जा रहे हैं।

आयोग बिजली की दरों में वृद्धि का कंपनी और सरकार पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखते हुए ही निर्णय लेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि आयोग आमतौर पर बिजली कंपनी द्वारा वृद्धि के प्रस्ताव को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता। पिछले दस वर्षों में औसत वृद्धि लगभग 4 प्रतिशत रही है। केवल एक-दो वर्षों में ही 8 प्रतिशत से अधिक वृद्धि देखी गई है। ऐसे में अगले वित्तीय वर्ष में बिजली की दरों पांच से सात प्रतिशत के बीच वृद्धि के आसार दिख रहे हैं।

जन सुनवाई में दरों में बढ़ोतरी के खिलाफ दिए गए तर्क उद्योग जगत: मिनी स्टील प्लांट एसोसिएशन के महासचिव मनीष धुप्पड़ का कहना है कि हम बिजली उत्पादन का 35 प्रतिशत तक उपभोग करते हैं। छत्तीसगढ़ में भी अन्य राज्यों की तरह पांच वर्षों की एस्टीमेटेड टैरिफ नीति लागू की जाए। प्रति युनिट औसतन 7 रुपए के भुगतान को घटाकर 5 रुपए किया जाए।

कृषि उपभोक्ता: छत्तीसगढ़ युवा प्रगतिशील किसान संघ के उपाध्यक्ष प्रफुल्ल टांक ने कहा कि सिंचाई की लागत पहले से बढ़ी हुई है। डीजल, खाद और मजदूरी की दरों में बढ़ोतरी के कारण खेती की लागत संरचना पहले से काफी बढ़ी हुई है। ऐसे हालात में बिजली दरों में वृद्धि किए जाने से किसानों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा।

गैर-घरेलू उपभोक्ता: दुकानदारों, व्यापारियों और सेवा क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने कहा कि बाजार पहले से सुस्ती के दौर से गुजर रहा है। बिजली बिल उनके मासिक स्थायी खर्च का बड़ा हिस्सा है। किराया, जीएसटी व अन्य करों के बीच अतिरिक्त वृद्धि छोटे कारोबार के मार्जिन पर सीधा असर डालेगी।

आयोग हमेशा अपनाता है बीच का रास्ता

वैसे बिजली कंपनी ने जब भी राजस्व घाटे का दावा किया, आयोग ने बीच का ही रास्ता चुना है। वर्ष 2024-25 में 8.35 प्रतिशत की वृद्धि को छोड़ दें तो ज्यादातर वर्षों में बढ़ोतरी सीमित ही रही। कोविड और फिर चुनाव वाले वर्षों में वृद्धि नहीं हुई। इसके अलावा कभी भी लगातार दो वर्ष भारी दर वृद्धि के उदाहरण नहीं हैं।

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