79वें BAFTA Awards 2026 में भारत के लिए एक ऐतिहासिक क्षण दर्ज हुआ, जब मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’ ने बेस्ट चिल्ड्रन एंड फैमिली फिल्म कैटेगरी में बाजी मार ली। यह जीत सिर्फ एक फिल्म की सफलता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के क्षेत्रीय स्वर की वैश्विक पहचान का प्रतीक बन गई। इस गौरवपूर्ण उपलब्धि के बाद प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी फिल्म की टीम को बधाई देते हुए इसे देश की अपार रचनात्मक प्रतिभा का उदाहरण बताया।
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि इस फिल्म से जुड़े सभी लोगों को हार्दिक बधाई। उन्होंने विशेष रूप से मणिपुर के लिए इसे गर्व और खुशी का क्षण बताया और कहा कि यह उपलब्धि भारत की सृजनात्मक क्षमता को दुनिया के सामने उजागर करती है।
लंदन में आयोजित भव्य समारोह में फिल्म की टीम ने यह सम्मान प्राप्त किया। ‘बूंग’ के निर्माता Farhan Akhtar, Ritesh Sidhwani, निर्देशक Laxmipriya Devi और Alan McAlex ने मंच पर बाफ्टा ट्रॉफी थामी। यह दृश्य न केवल टीम के लिए, बल्कि पूरे भारतीय सिनेमा के लिए गर्व का पल बन गया।
सम्मान स्वीकार करते हुए लक्ष्मिप्रिया देवी ने मणिपुर की मौजूदा परिस्थितियों का भावुक जिक्र किया। उन्होंने राज्य में शांति की कामना की और कहा कि वे उम्मीद करती हैं कि आंतरिक रूप से विस्थापित बच्चे—जिनमें फिल्म के कुछ बाल कलाकार भी शामिल हैं—एक बार फिर अपने सपनों और मासूमियत को जी सकें। उनके शब्दों ने समारोह में मौजूद लोगों को गहराई से प्रभावित किया।
‘बूंग’ की कहानी मणिपुर की पृष्ठभूमि में बुनी गई एक संवेदनशील और भावनात्मक यात्रा है। फिल्म एक छोटे बच्चे बूंग के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने बिछड़े पिता को खोजकर परिवार को फिर से जोड़ने का सपना देखता है। यह सिर्फ एक बच्चे की कहानी नहीं, बल्कि उम्मीद, रिश्तों और संघर्ष के बीच जिंदा रहने की जिद की दास्तान है। मुख्य किरदार को गुगुन किपजेन ने निभाया है, जबकि उसकी मां मंदाकिनी की भूमिका बाला हिजाम ने सजीव की है।
निर्देशन की कमान लक्ष्मिप्रिया देवी ने संभाली, जबकि निर्माण में फरहान अख्तर के साथ विकेश भूटानी, एलन मैकएलेक्स, रितेश सिधवानी और शुजात सौदागर जैसे नाम जुड़े रहे। फिल्म की सादगी, भावनात्मक गहराई और क्षेत्रीय संवेदनाओं को वैश्विक मंच पर सराहना मिली।
‘बूंग’ की यह जीत कई मायनों में खास है। यह बताती है कि भारत की कहानियां सिर्फ बड़े शहरों या मुख्यधारा तक सीमित नहीं हैं। देश के सुदूर राज्यों से उठने वाली आवाजें भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंज सकती हैं। मणिपुर जैसे राज्य से आई एक भावनात्मक फिल्म का BAFTA जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार जीतना भारतीय सिनेमा के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलता है।
यह उपलब्धि सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि उस विश्वास की जीत है कि सच्ची कहानियां सीमाओं से परे जाती हैं। ‘बूंग’ ने साबित कर दिया कि संवेदनशील सिनेमा और मानवीय भावनाएं दुनिया की हर भाषा में समझी जाती हैं—और सराही भी जाती हैं।