ईरान-इजराइल तनाव से अमेरिकी शेयर बाजार में गिरावट, डाउ जोंस 453 अंक फिसला; तेल महंगा और बेरोजगारी बढ़ने से दबाव

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मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक बाजारों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष की स्थिति के बीच अमेरिकी शेयर बाजार में गिरावट दर्ज की गई। 6 मार्च को अमेरिकी बाजार में प्रमुख सूचकांक नीचे बंद हुए, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई।

कारोबार के अंत में डाउ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज 453 अंक यानी करीब 0.95 प्रतिशत गिरकर 47,501 के स्तर पर बंद हुआ। टेक कंपनियों से जुड़ा नैस्डैक कंपोजिट भी कमजोर रहा और यह 361 अंक यानी 1.59 प्रतिशत की गिरावट के साथ 22,387 पर बंद हुआ। वहीं एसएंडपी 500 इंडेक्स 90 अंक यानी 1.33 प्रतिशत गिरकर 6,740 के स्तर पर आ गया।

विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिकी बाजार में आई इस गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारण हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव माना जा रहा है।

सबसे पहले कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने बाजार के माहौल को प्रभावित किया। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 7.15 प्रतिशत बढ़कर 91.52 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई, जो अप्रैल 2024 के बाद सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। तेल महंगा होने से वैश्विक महंगाई बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ता है।

दूसरा बड़ा कारण अमेरिका में कमजोर रोजगार आंकड़े रहे। अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले महीने नॉन-फार्म पेरोल में करीब 92 हजार नौकरियों की कमी दर्ज की गई। साथ ही फरवरी में बेरोजगारी दर बढ़कर 4.4 प्रतिशत हो गई। यह संकेत देता है कि अमेरिकी श्रम बाजार कमजोर पड़ रहा है और कंपनियां भर्ती की जगह छंटनी कर रही हैं।

बाजार में एक और चिंता ‘स्टैगफ्लेशन’ को लेकर भी बढ़ गई है। स्टैगफ्लेशन वह स्थिति होती है जब आर्थिक विकास धीमा पड़ जाता है लेकिन महंगाई बढ़ती रहती है। कमजोर रोजगार आंकड़े और तेल की कीमतों में तेजी ने इस आशंका को और मजबूत कर दिया है।

इसके अलावा ब्याज दरों को लेकर भी निवेशकों की उम्मीदें कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं। पहले उम्मीद थी कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस वर्ष कम से कम दो बार ब्याज दरों में कटौती करेगा, लेकिन अब बढ़ती महंगाई की आशंका के कारण बाजार को लगने लगा है कि शायद इस साल केवल एक ही बार दरों में कटौती हो पाए। ऊंची ब्याज दरें आमतौर पर शेयर बाजार के लिए नकारात्मक मानी जाती हैं क्योंकि इससे निवेशकों का पैसा सुरक्षित विकल्पों की ओर चला जाता है।

रिटेल सेक्टर के कमजोर प्रदर्शन ने भी बाजार पर दबाव बनाया। हालिया रिपोर्ट में सामने आया है कि अमेरिकी रिटेल कंपनियों का राजस्व उम्मीद से कम रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका में उपभोक्ता खर्च धीमा पड़ रहा है और लोग खर्च करने में सावधानी बरत रहे हैं।

हालांकि जहां अमेरिकी बाजार में गिरावट देखी गई, वहीं एशियाई बाजारों में सकारात्मक रुख देखने को मिला। दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स हल्की बढ़त के साथ बंद हुआ। जापान का निक्केई इंडेक्स करीब 343 अंक यानी 0.62 प्रतिशत चढ़कर 55,621 के स्तर पर बंद हुआ। हांगकांग का हैंगसेंग इंडेक्स भी 436 अंक यानी 1.72 प्रतिशत की तेजी के साथ 25,757 पर पहुंच गया। वहीं चीन का शंघाई कंपोजिट इंडेक्स भी 15 अंक से अधिक बढ़कर 4,124 के स्तर पर बंद हुआ।

भारतीय शेयर बाजार में भी गिरावट दर्ज की गई। 6 मार्च को सेंसेक्स 1,097 अंक यानी 1.37 प्रतिशत गिरकर 78,919 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 315 अंक यानी 1.27 प्रतिशत गिरकर 24,450 पर आ गया। भारतीय बाजार में बैंकिंग, रियल्टी और ऑटो सेक्टर के शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली देखी गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब दुनिया में जियोपॉलिटिकल तनाव या युद्ध जैसी स्थिति बनती है तो महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है। इससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है और निवेशक जोखिम से बचने के लिए शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोना, चांदी जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करने लगते हैं। यही कारण है कि ऐसे हालात में वैश्विक बाजारों में अक्सर गिरावट देखने को मिलती है।

गौरतलब है कि अमेरिकी बाजार में इससे एक दिन पहले भी कमजोरी देखने को मिली थी। उस दिन डाउ जोंस 785 अंक गिरकर 47,955 के स्तर पर बंद हुआ था, जबकि नैस्डैक और एसएंडपी 500 में भी गिरावट दर्ज की गई थी।

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