देश में महंगाई को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ने लगी है। फरवरी महीने में थोक महंगाई दर यानी होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) बढ़कर 2.13 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो पिछले 12 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में सामने आई है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आर्थिक और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है और इसका असर बाजार पर दिखाई देने लगा है।
वाणिज्य मंत्रालय द्वारा 16 मार्च को जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2026 में थोक महंगाई दर 1.81 प्रतिशत थी, जबकि दिसंबर में यह केवल 0.83 प्रतिशत पर दर्ज की गई थी। यानी दो महीनों के भीतर महंगाई में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि फरवरी 2025 में थोक महंगाई दर 2.38 प्रतिशत थी, जो मौजूदा स्तर से थोड़ी अधिक थी, लेकिन फिर भी इस साल फरवरी में दर्ज किया गया आंकड़ा पिछले एक साल के मुकाबले काफी ऊंचा माना जा रहा है।
महंगाई में इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं और खाने-पीने के सामान की कीमतों में आई तेजी को माना जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार प्राइमरी आर्टिकल यानी रोजाना इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की महंगाई दर जनवरी में 2.21 प्रतिशत थी, जो फरवरी में बढ़कर 3.27 प्रतिशत हो गई। इसी तरह खाद्य पदार्थों की महंगाई दर, जो पहले माइनस 1.41 प्रतिशत पर थी, फरवरी में बढ़कर 1.85 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका मतलब है कि अनाज, सब्जियां और अन्य खाद्य सामग्री के दामों में तेज उछाल देखने को मिला है।
इसके अलावा ईंधन और ऊर्जा से जुड़े क्षेत्र में भी कीमतों में बदलाव देखने को मिला है। फ्यूल और पावर की थोक महंगाई दर पहले माइनस 4.01 प्रतिशत थी, जो फरवरी में थोड़ा सुधरकर माइनस 3.78 प्रतिशत पर आ गई। वहीं मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर यानी फैक्ट्री में बनने वाले उत्पादों की थोक महंगाई दर भी 2.86 प्रतिशत से बढ़कर 2.92 प्रतिशत हो गई है।
थोक महंगाई को समझने के लिए इसके विभिन्न हिस्सों को जानना भी जरूरी है। होलसेल प्राइस इंडेक्स मुख्य रूप से तीन बड़े हिस्सों में बांटा जाता है। इनमें प्राइमरी आर्टिकल्स का वेटेज 22.62 प्रतिशत है, फ्यूल एंड पावर का वेटेज 13.15 प्रतिशत है, जबकि मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का हिस्सा सबसे ज्यादा यानी लगभग 64.23 प्रतिशत है। प्राइमरी आर्टिकल्स के भीतर भी कई श्रेणियां शामिल होती हैं, जिनमें फूड आर्टिकल्स जैसे गेहूं, अनाज और सब्जियां, नॉन-फूड आर्टिकल्स जैसे ऑयल सीड, खनिज पदार्थ और कच्चा पेट्रोलियम शामिल होते हैं।
इस बीच खुदरा महंगाई यानी रिटेल इन्फ्लेशन में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। फरवरी में रिटेल महंगाई बढ़कर 3.21 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि जनवरी में यह 2.74 प्रतिशत थी। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है और इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। कई विशेषज्ञों का अनुमान है कि ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। अगर ऐसा होता है तो भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ जाएगी, जिसका असर फल-सब्जियों से लेकर रोजमर्रा के हर सामान की कीमतों पर दिखाई देगा।
थोक महंगाई का असर सीधे तौर पर आम उपभोक्ताओं पर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन अगर यह लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है तो इसका बोझ आखिरकार आम जनता पर ही पड़ता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्पादक कंपनियां बढ़ी हुई लागत को कंज्यूमर्स पर डाल देती हैं। सरकार इस स्थिति को कुछ हद तक टैक्स नीति के जरिए नियंत्रित करने की कोशिश करती है। उदाहरण के तौर पर जब कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो सरकार कई बार पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी कम कर देती है। हालांकि टैक्स कटौती की भी एक सीमा होती है और सरकार हमेशा इस उपाय का इस्तेमाल नहीं कर सकती।
भारत में महंगाई को मापने के लिए दो प्रमुख सूचकांकों का उपयोग किया जाता है। पहला है कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी CPI, जिसे खुदरा महंगाई कहा जाता है। यह उन कीमतों के आधार पर तय होता है जो आम लोग बाजार में सामान खरीदते समय चुकाते हैं। दूसरा है होलसेल प्राइस इंडेक्स यानी WPI, जो थोक बाजार में एक व्यापारी द्वारा दूसरे व्यापारी से वसूली जाने वाली कीमतों पर आधारित होता है।
थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा लगभग 63 से 64 प्रतिशत के आसपास होती है, जबकि प्राइमरी आर्टिकल्स जैसे खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी करीब 22.62 प्रतिशत और फ्यूल एंड पावर की लगभग 13.15 प्रतिशत होती है। वहीं खुदरा महंगाई के आंकड़ों में खाद्य पदार्थों और उपभोक्ता उत्पादों की भागीदारी लगभग 45.86 प्रतिशत, हाउसिंग की करीब 10.07 प्रतिशत और ईंधन तथा अन्य सेवाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
कुल मिलाकर फरवरी में थोक और खुदरा दोनों तरह की महंगाई में बढ़ोतरी ने आर्थिक विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। अगर अंतरराष्ट्रीय हालात और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है तो आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है, जिसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।