Meta Pixel

‘उद्योग’ की नई परिभाषा तय करेगा सुप्रीम कोर्ट, सरकारी विभाग और NGO पर बड़ा फैसला आज से

Spread the love

देश की न्यायिक और आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक बेहद अहम मामला आज से सुनवाई के लिए सामने आया है। Supreme Court of India की 9 जजों की संविधान पीठ ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा को लेकर लंबित विवाद पर सुनवाई शुरू कर रही है। इस बेंच की अध्यक्षता Justice Surya Kant कर रहे हैं और यह सुनवाई आने वाले समय में श्रम कानूनों की दिशा तय कर सकती है।

यह मामला Industrial Disputes Act 1947 की धारा 2(j) से जुड़ा है, जिसमें ‘उद्योग’ की परिभाषा दी गई है। सवाल यह है कि क्या सरकारी विभाग, अस्पताल, शिक्षा संस्थान और NGO जैसी संस्थाएं भी ‘उद्योग’ के दायरे में आएंगी या नहीं। इसी पर अब सुप्रीम कोर्ट अंतिम फैसला देने जा रहा है।

दरअसल, इस विवाद की जड़ 1978 के ऐतिहासिक फैसले Bangalore Water Supply case 1978 में है, जहां जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने ‘उद्योग’ की बहुत व्यापक व्याख्या की थी। उस फैसले के बाद से कई सरकारी और गैर-लाभकारी संस्थाएं भी उद्योग की श्रेणी में आने लगीं और उन पर श्रम कानून लागू हो गए। अब इसी व्यापक परिभाषा की समीक्षा की जा रही है।

समय के साथ यह मुद्दा इतना बड़ा हो गया कि 2005 में 5 जजों की बेंच ने इसे बड़ी पीठ को सौंप दिया। इसके बाद 2017 में भी इसे और गंभीर मानते हुए 9 जजों की बेंच के पास भेजने की सिफारिश की गई थी। अब आखिरकार इस पर निर्णायक सुनवाई शुरू हो गई है।

इस सुनवाई में कई बड़े सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या हर संगठित गतिविधि को ‘उद्योग’ माना जाए या इसकी परिभाषा सीमित की जाए। इसके साथ ही यह भी तय होगा कि क्या नगरपालिका, सरकारी अस्पताल, शिक्षा संस्थान जैसे विभाग उद्योग माने जाएंगे या उन्हें अलग रखा जाएगा।

एक और बड़ा मुद्दा NGO और चैरिटी संस्थाओं का है। क्या ये संस्थाएं, जो लाभ के लिए काम नहीं करतीं, उन्हें भी उद्योग की श्रेणी में रखा जाएगा? इसके अलावा ‘सॉवरेन फंक्शन’ यानी सरकार के मूल कार्य—जैसे पुलिस, रक्षा—को उद्योग से बाहर रखने की सीमा भी तय की जाएगी।

इस फैसले का सीधा असर कर्मचारियों के अधिकारों पर पड़ेगा। अगर कोई संस्था ‘उद्योग’ मानी जाती है, तो वहां काम करने वाले कर्मचारियों को छंटनी, वेतन, यूनियन बनाने जैसे कई कानूनी अधिकार मिलते हैं। ऐसे में यह फैसला लाखों कर्मचारियों और संस्थाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई सिर्फ एक कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि देश के श्रम ढांचे और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि अदालत ‘उद्योग’ की परिभाषा को व्यापक रखती है या उसे सीमित कर नया रास्ता तय करती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *