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कांकेर के जंगलों में ‘सरेंडर गेम’, 18 नक्सलियों पर पुलिस की नजर, बढ़ती जा रही है समय की चुनौती

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छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के घने और दुर्गम जंगलों में इन दिनों एक अलग तरह की लड़ाई चल रही है। यह संघर्ष गोलियों का नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रणनीति और आत्मसमर्पण का है। सुरक्षा बल और पुलिस लगातार कोशिश कर रहे हैं कि सक्रिय नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटाया जाए, लेकिन यह मिशन आसान नहीं दिख रहा। समय तेजी से बीत रहा है और तय डेडलाइन अब बेहद करीब आ चुकी है, जिससे पुलिस और प्रशासन दोनों की चिंता बढ़ गई है।

कांकेर जिले में सक्रिय परतापुर एरिया कमेटी और कंपनी नंबर 05 के कुल 20 नक्सलियों में से 18 अब भी सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर हैं। हाल ही में दो नक्सली—मंगेश परचापी और उसकी पत्नी मनीषा—अचानक आरकेबी डिवीजन की ओर निकल गए, जिससे हालात और जटिल हो गए हैं। बताया जा रहा है कि ये दोनों कोहकाटोला इलाके में एक ठिकाने पर रुके हुए थे, लेकिन जैसे ही पुलिस की हलचल का अंदेशा हुआ, वे अपने हथियार और सामान छोड़कर जंगल में फरार हो गए।

इस घटनाक्रम के बाद कांकेर और मानपुर पुलिस की टीमें लगातार इन नक्सलियों की तलाश में जुटी हुई हैं। पुलिस अधीक्षकों के नेतृत्व में संयुक्त ऑपरेशन चलाया जा रहा है, लेकिन घने जंगल और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां इस अभियान को चुनौतीपूर्ण बना रही हैं। मंगेश और मनीषा के फरार होने के बाद अब बाकी 18 नक्सलियों के अबूझमाड़ और कांकेर के दुर्गम इलाकों में छिपे होने की आशंका जताई जा रही है।

इधर, पुलिस ने इन 18 नक्सलियों को आत्मसमर्पण के लिए तैयार करने के उद्देश्य से एक बड़ी रणनीति बनाई है। तीन अलग-अलग टीमें इस काम में लगी हुई हैं—एक टीम जगदलपुर से, दूसरी नारायणपुर से और तीसरी स्थानीय संपर्क सूत्रों के माध्यम से काम कर रही है। ये टीमें लगातार जंगल के भीतर जाकर संपर्क स्थापित करने और नक्सलियों को समझाने की कोशिश कर रही हैं कि वे हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौट आएं।

हालांकि अब तक इन प्रयासों को ठोस सफलता नहीं मिली है, लेकिन पुलिस का मानना है कि लगातार संवाद और दबाव की रणनीति से सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। इसके बावजूद, अगर आने वाले एक-दो दिनों में कोई ठोस प्रगति नहीं होती है, तो सुरक्षा बल एक बार फिर बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन शुरू कर सकते हैं।

कांकेर के जंगलों में चल रहा यह ‘सरेंडर गेम’ अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है, जहां एक तरफ पुलिस शांति और पुनर्वास का रास्ता दिखा रही है, तो दूसरी तरफ समय की टिक-टिक इस पूरे अभियान को और ज्यादा संवेदनशील बना रही है।

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