भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम और चिंताजनक संकेत सामने आया है, जहां रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहली बार 93.24 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। यह गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की महंगाई और विदेशी निवेशकों की तेज निकासी का मिला-जुला असर है, जिसने बाजार को हिला कर रख दिया है।
मुंबई में कारोबारी सत्र के दौरान रुपया करीब 0.65 प्रतिशत गिरकर इस ऐतिहासिक स्तर तक पहुंचा। इससे पहले यह 92.63 तक फिसला था, लेकिन मौजूदा हालात ने इसे और कमजोर कर दिया। खासतौर पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। यही वजह है कि कुछ ही समय में रुपया करीब 2 प्रतिशत तक टूट चुका है।
इस गिरावट में सबसे बड़ा योगदान कच्चे तेल की कीमतों में आई उछाल का है। खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा ढांचे पर हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। हालांकि बाद में थोड़ी नरमी आई, लेकिन स्थिति अब भी अस्थिर बनी हुई है। होरमुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक अहम रास्ता है, वहां बढ़ते खतरे ने बाजार की चिंता और बढ़ा दी है। कई देश इस रूट की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश में जुटे हैं, जबकि अमेरिका ने आपूर्ति बढ़ाने के संकेत दिए हैं।
विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी रुपये की हालत और कमजोर कर दी है। मार्च महीने में ही करीब 8 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है, जो पिछले एक साल में सबसे बड़ी बिकवाली में से एक मानी जा रही है। वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे भारतीय बाजार और मुद्रा दोनों पर दबाव बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल राहत के संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। अगर यही हालात बने रहे, तो रुपया 95 के स्तर तक भी जा सकता है। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है, जहां महंगाई बढ़ने और विकास दर पर दबाव आने की आशंका है। तेल की ऊंची कीमतें न केवल आयात बिल बढ़ाएंगी, बल्कि रोजमर्रा की चीजों को भी महंगा कर सकती हैं।
इसी बीच, वैश्विक वित्तीय हालात भी चुनौती बढ़ा रहे हैं। ब्याज दरों के ऊंचे स्तर पर बने रहने के संकेत और महंगाई के बढ़ते अनुमान यह दर्शाते हैं कि आने वाला समय आसान नहीं होगा। नोमुरा की अर्थशास्त्री सोनल वर्मा के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी महंगाई को लगभग 0.5 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। इसी आधार पर वित्त वर्ष 2027 के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 4.5 प्रतिशत कर दिया गया है।
हालांकि इन चुनौतियों के बीच एक सकारात्मक पक्ष भी है। यदि भारत अपनी आर्थिक गति बनाए रखता है, तो आने वाले वर्षों में विकास दर करीब 7 प्रतिशत तक रह सकती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वैश्विक हालात स्थिर हों और ऊर्जा की कीमतों पर नियंत्रण आए।
कुल मिलाकर, रुपये की यह रिकॉर्ड गिरावट भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक संकेत है, जो बताता है कि वैश्विक घटनाओं का असर अब सीधे घरेलू बाजार और आम आदमी की जेब तक पहुंच रहा है।