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नागपुर में भागवत का बड़ा बयान—स्वार्थ से जन्म लेते हैं युद्ध, भारत ही दिला सकता है दुनिया को शांति का रास्ता

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नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में Mohan Bhagwat ने वैश्विक हालात पर बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि दुनिया में हो रहे अधिकांश युद्ध और संघर्ष स्वार्थी हितों और वर्चस्व की चाहत का परिणाम हैं। अगर स्थायी शांति चाहिए, तो इसके लिए एकता, अनुशासन और धर्म के मूल सिद्धांतों को अपनाना होगा।

विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय की आधारशिला रखने के बाद सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले 2000 वर्षों में दुनिया ने संघर्षों को सुलझाने के कई प्रयास किए, लेकिन उन्हें बहुत सीमित सफलता ही मिली। इसका कारण यही है कि समाधान के बजाय स्वार्थ और प्रभुत्व की मानसिकता हावी रही।

भागवत ने भारत की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि भारत का मूल स्वभाव ही सद्भाव और संतुलन पर आधारित है। यही वजह है कि आज वैश्विक स्तर पर यह भरोसा बढ़ रहा है कि India ही Iran और Israel के बीच बढ़ते संघर्ष को खत्म कराने में अहम भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत की सोच ‘मानवता के नियम’ पर आधारित है, जबकि दुनिया के कई हिस्सों में अब भी ‘जंगल का कानून’ चलता है। उनके मुताबिक, आज की अस्थिर दुनिया को संतुलन में लाने के लिए धर्म आधारित जीवनशैली और नैतिक मूल्यों की जरूरत है, और इसमें भारत की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है।

अपने संबोधन में उन्होंने सामाजिक चुनौतियों का भी जिक्र किया। धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्म परिवर्तन और ऊंच-नीच जैसी समस्याएं आज भी समाज में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि भारत का प्राचीन ज्ञान हमें यह सिखाता है कि सभी मनुष्य आपस में जुड़े हुए हैं और एक हैं, इसलिए व्यवहार में भी यह भावना दिखनी चाहिए।

भागवत ने स्पष्ट किया कि धर्म केवल किताबों या शास्त्रों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह लोगों के आचरण में भी झलकना चाहिए। उन्होंने अनुशासन और नैतिक मूल्यों को जीवन में उतारने के लिए निरंतर अभ्यास पर जोर दिया और कहा कि इसमें व्यक्तिगत चुनौतियां भी आती हैं, लेकिन यही असली साधना है।

संगठनात्मक बदलावों पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि Rashtriya Swayamsevak Sangh तेजी से विस्तार कर रहा है, इसलिए काम को और प्रभावी बनाने के लिए संरचना में बदलाव किए जा रहे हैं। अब संघ को 46 प्रांतों के बजाय 86 संभागों में बांटा जाएगा, ताकि स्थानीय स्तर पर काम को और बेहतर तरीके से संचालित किया जा सके। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि संघ के काम करने का मूल तरीका नहीं बदलेगा—समाज में बदलाव लाने के लिए संवाद, उदाहरण और संबंधों का निर्माण ही प्राथमिक साधन बना रहेगा।

कुल मिलाकर, नागपुर से आया यह संदेश सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक दिशा दिखाने वाला बयान माना जा रहा है, जिसमें शांति, संतुलन और मानवता को सबसे ऊपर रखा गया है।

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