छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में वामपंथी उग्रवाद के खात्मे के लिए चलाया जा रहा ‘मिशन 2026 द एंड गेम’ अब अपने अंतिम और निर्णायक चरण में पहुंच चुका है। सुरक्षा बलों का साफ लक्ष्य है कि 31 मार्च 2026 तक इस क्षेत्र से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया कर दिया जाए। इसी उद्देश्य के साथ अबूझमाड़ और नेशनल पार्क जैसे दुर्गम इलाकों में बड़े पैमाने पर लगातार ऑपरेशन चलाए जा रहे हैं।
इस वक्त हजारों जवान जंगलों में तैनात हैं और उनका फोकस उन इलाकों पर है, जहां बचे हुए नक्सलियों के छिपे होने की संभावना है। लगातार सर्च ऑपरेशन के साथ-साथ आत्मसमर्पण के लिए भी अपील तेज कर दी गई है। पुलिस ही नहीं, बल्कि नक्सलियों के परिवारों के जरिए भी उन्हें मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति और सटीक इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन ने नक्सली नेटवर्क को गहराई से कमजोर कर दिया है। उनके ठिकाने खत्म हुए हैं, लॉजिस्टिक सपोर्ट टूट चुका है और नेतृत्व भी बिखर गया है। इसका असर यह हुआ है कि नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंच गई है, जो इस अभियान की बड़ी सफलता मानी जा रही है।
अब जब मिशन के समापन में कुछ ही दिन शेष हैं, तो सुरक्षा बल पूरी ताकत और रणनीतिक फोकस के साथ अंतिम कार्रवाई में जुटे हुए हैं। इस चरण में बचे हुए कैडर पर दबाव बढ़ाने और उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं, ताकि बिना अनावश्यक नुकसान के इस अभियान को सफलतापूर्वक समाप्त किया जा सके।
Sundarraj P ने स्पष्ट किया है कि यह मिशन अब अपने ‘एंड गेम’ चरण में है और इसका लक्ष्य बस्तर से वामपंथी उग्रवाद का पूर्ण उन्मूलन सुनिश्चित करना है। उन्होंने बताया कि बस्तर पुलिस, डीआरजी, बस्तर फाइटर्स, एसटीएफ, सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी और अन्य सुरक्षा बलों के बीच मजबूत समन्वय ने माओवादी ढांचे को लगभग तोड़ दिया है। साथ ही, प्रभावी आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के कारण बड़ी संख्या में कैडर मुख्यधारा में लौटे हैं।
फिलहाल सुरक्षा बलों के निशाने पर गिने-चुने शीर्ष नक्सली नेता और उनके सहयोगी हैं। टॉप-10 मोस्ट वांटेड नक्सलियों समेत करीब 50 उग्रवादियों को टारगेट किया गया है, जिन पर करोड़ों रुपए का इनाम घोषित है। इनमें पोलित ब्यूरो से जुड़े वरिष्ठ नेता और क्षेत्रीय कमांडर शामिल हैं, जो अब भी जंगलों में सक्रिय बताए जा रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियां इन सभी को लगातार आत्मसमर्पण का मौका दे रही हैं। स्पष्ट संदेश दिया गया है कि यदि तय समयसीमा के भीतर सरेंडर नहीं किया गया, तो उन्हें सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।
कुल मिलाकर, बस्तर में चल रहा यह अभियान केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सुरक्षा, विकास और पुनर्वास तीनों पहलुओं को साथ लेकर आगे बढ़ा जा रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या ‘मिशन 2026’ वास्तव में बस्तर को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त कर पाएगा।