देश में रसोई गैस का संकट अब आम लोगों की जेब और रसोई दोनों पर भारी पड़ने लगा है। एक ताजा सर्वे के मुताबिक हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हर पांच में से एक परिवार को गैस सिलेंडर ब्लैक में खरीदना पड़ रहा है। कीमतें इस कदर बढ़ गई हैं कि एक सिलेंडर के लिए लोगों को तय दर से ₹300 से लेकर ₹4000 तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ रहा है।
रिसर्च संस्था LocalCircles की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि गैस की कमी और डिलीवरी में देरी ने हालात को और खराब कर दिया है। जहां पिछले हफ्ते 14% लोग ब्लैक में सिलेंडर खरीद रहे थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 20% तक पहुंच गया है। यह तेजी से बिगड़ते हालात का साफ संकेत है।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि देश के 68% घरों तक गैस सिलेंडर समय पर नहीं पहुंच पा रहा है। यानी हर तीन में से दो परिवारों को देरी का सामना करना पड़ रहा है। सिर्फ 28% परिवार ही ऐसे हैं जिन्हें समय पर गैस मिल पा रही है। इससे साफ है कि सप्लाई चेन गंभीर दबाव में है।
स्थिति को और जटिल बना रही है ‘फैंटम डिलीवरी’ की समस्या। करीब 12% उपभोक्ताओं ने शिकायत की है कि उन्हें सिलेंडर डिलीवरी का मैसेज तो मिल जाता है, लेकिन असल में गैस उनके घर तक पहुंचती ही नहीं। इससे सरकारी डिजिटल सिस्टम पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं और लोगों का भरोसा कमजोर हो रहा है।
इस संकट के पीछे अंतरराष्ट्रीय कारण भी अहम हैं। Strait of Hormuz में तनाव और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते भारत में गैस और कच्चे तेल का आयात प्रभावित हुआ है। इसके अलावा कतर के रास लफ्फान जैसे बड़े LNG प्लांट के बंद होने से वैश्विक सप्लाई पर भी असर पड़ा है।
हालात ऐसे बन गए हैं कि शहरों में लोग अब पाइप्ड गैस (PNG) की ओर रुख कर रहे हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में लोग फिर से लकड़ी और पारंपरिक ईंधन पर निर्भर होने लगे हैं। यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर संकेत देती है।
सरकार ने इस संकट को देखते हुए कार्रवाई तेज कर दी है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, कालाबाजारी रोकने के लिए देशभर में 4500 से ज्यादा छापेमारी की गई है और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने भी 1800 से अधिक निरीक्षण किए हैं। साथ ही कंट्रोल रूम और मॉनिटरिंग सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है।
इसके बावजूद हालात पूरी तरह काबू में नहीं आए हैं। अब मांग उठ रही है कि जमाखोरी और फर्जी डिलीवरी करने वालों के खिलाफ और सख्त कदम उठाए जाएं, ताकि आम लोगों को राहत मिल सके।
कुल मिलाकर, गैस का यह संकट केवल सप्लाई का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह आम जनता के दैनिक जीवन, खर्च और भरोसे से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।