पश्चिम बंगाल में इस बार रामनवमी केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सियासी शक्ति प्रदर्शन का बड़ा मंच बन गई है। 27 मार्च को मनाए जा रहे इस पर्व ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह गर्मा दिया है, जहां भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस आमने-सामने खड़ी नजर आ रही हैं। एक तरफ बीजेपी हिंदुओं पर कथित अत्याचार के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है, वहीं टीएमसी ‘राम सबके हैं’ का संदेश देकर अपनी अलग राजनीतिक लाइन तैयार कर रही है।
राज्यभर में इस बार करीब 20,000 शोभायात्राओं और जुलूसों का अनुमान है, जिससे साफ है कि रामनवमी का उत्साह इस बार अपने चरम पर है। बीजेपी और उससे जुड़े हिंदू संगठन इसे बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी में हैं और पांच दिनों तक चलने वाले कार्यक्रमों के जरिए अपनी मौजूदगी को मजबूत करना चाहते हैं। पार्टी इस मंच का उपयोग करते हुए बांग्लादेश और बंगाल के कुछ जिलों—जैसे मुर्शिदाबाद और आसनसोल—में हिंदुओं के खिलाफ कथित घटनाओं को प्रमुख मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।
वहीं दूसरी ओर, कानून-व्यवस्था को लेकर प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड में है। खासकर आसनसोल और हावड़ा जैसे संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं, जहां पहले भी रामनवमी के दौरान हिंसा और झड़पें देखने को मिल चुकी हैं। कोलकाता हाईकोर्ट ने जुलूसों को अनुमति तो दी है, लेकिन हथियारों के प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक लगा दी है। अदालत ने साफ किया है कि जुलूस शांतिपूर्ण होने चाहिए और किसी भी तरह की उग्रता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हालांकि, हथियारों के प्रदर्शन को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। पुरुलिया और अन्य क्षेत्रों में बीजेपी से जुड़े कार्यकर्ता और अखाड़े यह कह रहे हैं कि उनकी परंपरा में शस्त्र प्रदर्शन शामिल है और वे इसी तरह रैली निकालेंगे। उनका तर्क है कि हिंदू देवी-देवताओं की परंपरा में शस्त्र धारण का महत्व है, इसलिए इसे रोका नहीं जाना चाहिए। इस मुद्दे पर प्रशासन और बीजेपी के बीच टकराव की स्थिति बनती दिख रही है।
मालदा जैसे जिलों में भी माहौल पूरी तरह चुनावी रंग में रंगा हुआ है, जहां दर्जनों संगठनों ने मिलकर लंबी और भव्य रैली निकालने की तैयारी की है। बताया जा रहा है कि इस बार भीड़ पिछले साल के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ सकती है। हालांकि, प्रशासन ने अनुमति प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया है, जिससे पारदर्शिता बनी रहे और विवाद कम हो सके।
इसी बीच तृणमूल कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अब टीएमसी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह पर चलते हुए रामनवमी में सक्रिय भागीदारी दिखा रही है। पार्टी के नेता खुलकर कह रहे हैं कि भगवान राम किसी एक दल के नहीं, बल्कि पूरे समाज के हैं। हुगली और अन्य क्षेत्रों में टीएमसी ‘अस्त्रहीन संकीर्तन रैली’ निकालने की तैयारी कर रही है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि वह भी हिंदू भावनाओं के साथ खड़ी है, लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव महज प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है। टीएमसी के स्थानीय नेता अब खुद रैलियों में हिस्सा ले रहे हैं और कई जगहों पर अखाड़ों का नेतृत्व भी कर रहे हैं, ताकि वोटों का ध्रुवीकरण रोका जा सके।
पिछले एक दशक में पश्चिम बंगाल में रामनवमी का स्वरूप तेजी से बदला है। पहले यह सीमित स्तर पर मनाया जाने वाला धार्मिक आयोजन था, लेकिन अब यह बड़े राजनीतिक आयोजन में तब्दील हो चुका है। खासकर 2018 के रानीगंज और आसनसोल दंगों के बाद राज्य की राजनीति में इसका महत्व काफी बढ़ गया। इसका असर 2019 के लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिला, जब बीजेपी ने राज्य में अपनी सीटें 2 से बढ़ाकर 18 कर ली थीं।
इस बार भी उत्तर बंगाल के कई जिलों में भारी भीड़ जुटने की संभावना है, जिससे साफ है कि रामनवमी अब केवल आस्था का नहीं, बल्कि सियासी ताकत का भी प्रतीक बन चुकी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस धार्मिक उत्सव के जरिए कौन सी पार्टी जनता के दिलों में अपनी जगह बनाने में सफल होती है।
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में रामनवमी इस बार एक ‘सियासी लिटमस टेस्ट’ बन गई है, जहां आस्था और राजनीति का संगम चुनावी नतीजों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।