छत्तीसगढ़ में इन दिनों गैस सिलेंडर सिर्फ एक घरेलू जरूरत नहीं, बल्कि सियासत और सोशल मीडिया का बड़ा मुद्दा बन गया है। रायपुर, भिलाई, दुर्ग और बिलासपुर जैसे शहरों से लगातार ऐसी तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं, जिनमें गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें, खाली सिलेंडर और इंतजार करते लोग नजर आ रहे हैं। आम जनता की परेशानी अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खुलकर सामने आ रही है, जहां लोग अपनी नाराजगी के साथ-साथ व्यंग्य और मीम्स के जरिए सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम को और ज्यादा हवा तब मिली, जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर एक सीधा सवाल दाग दिया—“सिलेंडर मिल रहा है न?” यह सवाल जैसे ही सामने आया, कमेंट सेक्शन में प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कई लोगों ने लिखा कि उन्हें बिना किसी दिक्कत के सिलेंडर मिल रहा है, तो वहीं बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने साफ कहा कि बुकिंग के कई दिन बाद भी उन्हें गैस नहीं मिल पा रही।
भूपेश बघेल के इस पोस्ट को बीजेपी छत्तीसगढ़ ने तुरंत लपक लिया और जवाबी हमला करते हुए लिखा कि “भ्रम फैलाने निकले थे, जनता ने सच बता दिया।” लेकिन इसके बाद बघेल ने भी पलटवार किया और एक वीडियो साझा करते हुए ऐसे कमेंट्स दिखाए, जिनमें लोग गैस न मिलने की शिकायत कर रहे थे। इस तरह सिलेंडर का मुद्दा अब आम लोगों की परेशानी से निकलकर सीधे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बन गया।
सोशल मीडिया पर इस मुद्दे ने एक अलग ही रूप ले लिया है। तिल्दा-नेवरा से वायरल हुए वीडियो में लोग सिलेंडर कार्ड जमीन पर रखकर नंबर लगाते और धूप से बचने के लिए छांव में इंतजार करते दिखे। वहीं कुछ यूजर्स ने AI की मदद से ऐसे वीडियो बनाए, जिनमें गैस सिलेंडर को “विदा लेते” और इंडक्शन चूल्हे को “वापसी करते” दिखाया गया। यह वीडियो न सिर्फ मनोरंजक हैं, बल्कि व्यवस्था पर कटाक्ष भी करते नजर आते हैं।
कई यूजर्स ने पुराने दिनों की याद दिलाते हुए कंडों और लकड़ी के चूल्हे की ओर लौटने की बात भी अपने वीडियो में दिखाई। एक वीडियो में तो यहां तक दिखाया गया कि लोग अब फिर से गोबर इकट्ठा कर खाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं। यह दृश्य कहीं न कहीं लोगों की हताशा और सिस्टम के प्रति नाराजगी को उजागर करता है।
भिलाई और दुर्ग जैसे इलाकों से भी लगातार पोस्ट सामने आ रहे हैं, जहां लोग बता रहे हैं कि गैस बुकिंग के 8-10 दिन बाद भी डिलीवरी नहीं हो रही। कई लोगों को एजेंसी के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कुछ यूजर्स ने बच्चों के सिलेंडर ढोते हुए वीडियो शेयर कर तंज कसा कि “बच्चों को तो मिल जा रहा है, हमें नहीं।”
मीम्स और रील्स में सिलेंडर को सोने से भी ज्यादा कीमती बताया जा रहा है। एक वायरल पोस्ट में लिखा गया कि “आजकल घर में गैस सिलेंडर आ जाए तो त्योहार जैसा माहौल हो जाता है।” यह लाइन भले ही मजाक में कही गई हो, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई आम आदमी की परेशानी को साफ बयान करती है।
स्थानीय सोशल मीडिया पेज और न्यूज हैंडल्स भी इस मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं। एजेंसियों के बाहर की भीड़, लोगों के बयान और इंतजार की तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं। कई लोगों का दावा है कि सप्लाई कम होने की वजह से यह स्थिति बनी है, जबकि प्रशासन और सरकार लगातार यह कह रही है कि सप्लाई पूरी तरह सामान्य है और किसी तरह की कोई कमी नहीं है।
यही विरोधाभास अब पूरे विवाद की जड़ बन गया है—एक तरफ आम जनता की शिकायतें और वायरल हो रहे वीडियो, तो दूसरी तरफ प्रशासन का “सब सामान्य है” वाला दावा। इस बीच सियासत ने भी इस मुद्दे को अपने रंग में रंग लिया है, जहां हर पक्ष अपनी-अपनी बात को सही साबित करने में जुटा है।
अब सवाल यही है कि सच्चाई क्या है—क्या वाकई गैस की किल्लत है या फिर यह सिर्फ सोशल मीडिया का बना हुआ नैरेटिव है? जवाब जो भी हो, इतना साफ है कि सिलेंडर का मुद्दा अब सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह जनता की परेशानी, राजनीति की रणनीति और सोशल मीडिया की ताकत—तीनों का संगम बन चुका है।