दुनिया के ऊर्जा बाजार में एक बड़ा झटका तब लगा जब Russia ने 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक पेट्रोल निर्यात पर रोक लगाने का फैसला किया। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और तेल बाजार में अस्थिरता पहले से ही चिंता का विषय बने हुए हैं।
रूस के उप-प्रधानमंत्री Alexander Novak ने इस फैसले के पीछे साफ वजह बताते हुए कहा कि सरकार घरेलू सप्लाई को बनाए रखना और ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखना चाहती है। रूस हर दिन करीब 1.2 से 1.7 लाख बैरल पेट्रोल निर्यात करता है, ऐसे में इस रोक का असर वैश्विक सप्लाई पर पड़ना तय माना जा रहा है।
इस फैसले का सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ेगा जो रूस से तैयार पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर हैं, जैसे चीन, तुर्किये, ब्राजील और अफ्रीकी देश। वहीं भारत के लिए स्थिति अपेक्षाकृत राहत भरी है, क्योंकि भारत सीधे पेट्रोल नहीं बल्कि कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) आयात करता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 80% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें रूस की हिस्सेदारी लगभग 20% तक पहुंच चुकी है। देश के पास मजबूत रिफाइनरी नेटवर्क है, जहां कच्चे तेल को प्रोसेस कर पेट्रोल-डीजल बनाया जाता है। यही वजह है कि रूस के इस फैसले का भारत पर सीधा असर बहुत सीमित रहने की संभावना है।
हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अगर रूस के इस फैसले से वैश्विक सप्लाई घटती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है। पहले से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, और इस तरह के फैसले कीमतों को और ऊपर धकेल सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि भारत ने हाल ही में रूस से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की खरीद की है। अप्रैल डिलीवरी के लिए करीब 6 करोड़ बैरल तेल का सौदा किया गया है, लेकिन अब यह तेल पहले की तरह सस्ता नहीं मिल रहा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत को अब ब्रेंट क्रूड की कीमत से 5 से 15 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा देकर रूसी तेल खरीदना पड़ रहा है।
कुल मिलाकर, रूस का यह फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई हलचल पैदा कर सकता है। भारत को फिलहाल राहत जरूर है, लेकिन अगर कीमतें बढ़ती हैं तो इसका असर आम लोगों की जेब पर भी देखने को मिल सकता है।