कोविड वैक्सीनेशन के दौर में देखी गई हिचक अब एक बार फिर सामने आ रही है, लेकिन इस बार मामला और भी गंभीर है। गर्भाशय के मुख के कैंसर यानी सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए लगाए जाने वाले HPV वैक्सीनेशन को लेकर लोगों में उत्साह की जगह संकोच दिखाई दे रहा है। रायपुर जिले के आंकड़े इस चिंता को और गहरा कर देते हैं, जहां लगभग 28 हजार किशोरियों को यह टीका लगाया जाना है, लेकिन दस दिनों में महज 20 ही अस्पताल पहुंच पाईं।
केंद्र सरकार ने देशभर में किशोरियों को इस गंभीर बीमारी से बचाने के लिए HPV वैक्सीन को मुफ्त उपलब्ध कराने का बड़ा फैसला लिया है। इसी के तहत छत्तीसगढ़ में भी जिला स्तर पर टीकाकरण अभियान शुरू किया गया है। रायपुर के कालीबाड़ी मातृ शिशु चिकित्सालय में 14 से 15 साल की किशोरियों को ओपीडी समय में यह वैक्सीन लगाई जा रही है, लेकिन शुरुआत से ही लोगों की उदासीनता साफ नजर आ रही है।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल स्कूलों में परीक्षाएं चल रही हैं, जिसकी वजह से अभिभावक अपनी बेटियों को अस्पताल नहीं ला पा रहे हैं। उनका मानना है कि अप्रैल में परीक्षाएं खत्म होने के बाद टीकाकरण की रफ्तार बढ़ सकती है। लेकिन जमीनी हकीकत केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं दिखती।
दरअसल, कोरोना महामारी के दौरान लगे टीकों और उसके बाद सामने आए हार्ट अटैक के मामलों को लेकर फैली चर्चाओं ने लोगों के मन में वैक्सीनेशन को लेकर एक तरह का डर पैदा कर दिया है। यही वजह है कि लोग अब नए टीकों को लेकर ज्यादा सतर्क, बल्कि कहें तो संदेहपूर्ण हो गए हैं। यह झिझक ही इस महत्वपूर्ण अभियान में सबसे बड़ी बाधा बन रही है।
अगर पूरे राज्य की बात करें तो करीब साढ़े तीन लाख किशोरियों को यह टीका लगाया जाना है, लेकिन मौजूदा रफ्तार को देखकर यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं दिखता। जबकि विशेषज्ञ लगातार यह बताते रहे हैं कि HPV वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर से बचाव का एक प्रभावी और सुरक्षित तरीका है, जिसे समय पर लगवाना बेहद जरूरी है।
दिलचस्प बात यह है कि जहां सरकारी अस्पतालों में यह वैक्सीन पूरी तरह मुफ्त दी जा रही है, वहीं निजी अस्पतालों में इसके लिए करीब दो हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। इसके बावजूद सरकारी सुविधाओं का पूरा लाभ नहीं उठाया जा रहा है। वैक्सीनेशन के लिए केवल आधार कार्ड या जन्मतिथि का प्रमाण देना होता है और टीका लगने के बाद किशोरी को प्रमाण पत्र भी दिया जाता है।
यह स्थिति केवल एक स्वास्थ्य अभियान की धीमी शुरुआत नहीं, बल्कि जागरूकता की कमी और अफवाहों के असर को भी दर्शाती है। अगर समय रहते लोगों की झिझक दूर नहीं की गई, तो एक गंभीर बीमारी से बचाव का यह अवसर हाथ से निकल सकता है।