छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पुलिस विभाग की कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाते हुए बर्खास्त आरक्षक शिवकुमार सायतोड़े को फिर से सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि विभागीय जांच में गंभीर खामियां थीं और पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ गई, जिसके चलते यह कार्रवाई टिक नहीं सकती।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जांच के दौरान आरक्षक को गवाहों से जिरह करने का पूरा अवसर नहीं दिया गया। यह किसी भी निष्पक्ष जांच की मूल शर्त होती है, और इसकी अनदेखी करना न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना गया। इसी आधार पर कोर्ट ने विभाग की पूरी कार्रवाई को अवैध करार दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि यह मामला मूल रूप से एक पारिवारिक विवाद से जुड़ा था, जिसे अनावश्यक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया और उसी के आधार पर कठोर कार्रवाई कर दी गई। अदालत ने भी इस बात को स्वीकार किया कि आरोप मुख्यतः वैवाहिक विवाद पर आधारित थे और इनके समर्थन में कोई ठोस एवं स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि पुलिस कर्मियों से उच्च आचरण की अपेक्षा जरूर की जाती है, लेकिन केवल निजी विवाद के आधार पर किसी को सेवा से बर्खास्त करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता, खासकर तब जब जांच प्रक्रिया ही त्रुटिपूर्ण हो।
इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेश के साथ-साथ अपील और पुनरीक्षण के आदेशों को भी रद्द कर दिया। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि संबंधित आरक्षक को तुरंत सेवा में बहाल किया जाए और उसे सेवा की निरंतरता के साथ अन्य सभी लाभ भी दिए जाएं।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित अवधि के लिए केवल 50 प्रतिशत बैक वेतन ही दिया जाएगा। इसके अलावा, पुलिस विभाग को यह अधिकार भी दिया गया है कि यदि वह चाहे तो नियमों के तहत दोबारा जांच की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
यह फैसला न केवल संबंधित आरक्षक के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि किसी भी विभागीय कार्रवाई में निष्पक्षता और प्रक्रिया का पालन करना कितना जरूरी है।