इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर की बड़ी कंपनी Ola Electric को महाराष्ट्र से बड़ा झटका लगा है। ठाणे के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने कंपनी की सर्विस और प्रोडक्ट क्वालिटी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए उसे ग्राहक को नया स्कूटर देने या पूरी रकम ब्याज समेत लौटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस मामले को “सेवा में भारी कमी” और “अनुचित व्यापारिक व्यवहार” करार दिया है।
यह मामला नवी मुंबई के एक ग्राहक से जुड़ा है, जिन्होंने जुलाई 2024 में करीब 96,997 रुपए में नया इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदा था। लेकिन उनकी परेशानी खरीद के महज दो दिन बाद ही शुरू हो गई। पहली लंबी राइड के दौरान ही स्कूटर की स्पीड और एक्सीलरेशन में दिक्कत आने लगी और वाहन बार-बार बीच सड़क पर बंद होने लगा।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 29 अगस्त 2024 को स्कूटर की बैटरी अचानक 21% से गिरकर 3% पर पहुंच गई और स्कूटर ट्रैफिक के बीच रुक गया। इस घटना ने न सिर्फ ग्राहक को परेशान किया, बल्कि उनकी सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर दिए।
ग्राहक ने अपनी शिकायत कंपनी तक पहुंचाने के लिए कई बार ईमेल और व्हाट्सएप के जरिए संपर्क किया, लेकिन लंबे समय तक कोई जवाब नहीं मिला। आखिरकार जब मामला सोशल मीडिया पर उठाया गया, तब कंपनी हरकत में आई और स्कूटर को सर्विस के लिए ले गई। लेकिन यहां भी लापरवाही सामने आई—इंश्योरेंस कंपनी को इसकी जानकारी तक नहीं दी गई।
कई महीनों बाद जब स्कूटर वापस किया गया, तब भी हालत ठीक नहीं थी। वाहन गंदा था और उस पर खरोंच के निशान मौजूद थे। इससे ग्राहक की परेशानी और बढ़ गई, जिसके बाद उन्होंने उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने आई—कंपनी की ओर से कोई प्रतिनिधि कोर्ट में पेश ही नहीं हुआ। ऐसे में कोर्ट ने एकतरफा फैसला सुनाते हुए कड़ा रुख अपनाया।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि शुरुआत से ही स्कूटर में गंभीर तकनीकी खामियां थीं, जो इसे डिफेक्टिव साबित करती हैं। साथ ही, सर्विसिंग में देरी, सही जानकारी न देना और ग्राहक को लंबे समय तक परेशान करना कंपनी की बड़ी लापरवाही है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि कंपनी ग्राहक को उसी मॉडल का बिल्कुल नया स्कूटर दे। यदि यह संभव न हो, तो कंपनी को 6% सालाना ब्याज के साथ पूरी राशि वापस करनी होगी। इसके अलावा मानसिक कष्ट के लिए 20 हजार रुपए और कानूनी खर्च के रूप में 15 हजार रुपए अलग से देने का निर्देश भी दिया गया है।
यह फैसला न सिर्फ एक ग्राहक को राहत देता है, बल्कि यह भी साफ संदेश देता है कि कंपनियां अगर ग्राहकों की शिकायतों को नजरअंदाज करेंगी, तो उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।