छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले से जुड़े एक अहम मामले में हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर चल रही बहस को नई दिशा दे दी है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी व्यक्ति को अपने निजी घर में प्रार्थना या प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए प्रशासन या पुलिस से किसी तरह की पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। यह फैसला उन लोगों के लिए राहत लेकर आया है, जो लंबे समय से इस तरह के मामलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप का सामना कर रहे थे।
यह मामला नवागढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम गोधना के रहने वाले बद्री प्रसाद साहू और राजकुमार साहू से जुड़ा हुआ है। दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि वे साल 2016 से अपने घर की पहली मंजिल पर बने हॉल में मसीही समाज की प्रार्थना सभा करते आ रहे हैं, लेकिन नवागढ़ पुलिस द्वारा उन्हें लगातार नोटिस देकर परेशान किया जा रहा था। उनके अनुसार, पुलिस ने BNSS की धारा 94 के तहत नोटिस जारी कर न सिर्फ सभा रोकने का दबाव बनाया, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी प्रताड़ित किया।
सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि ग्राम पंचायत गोधना ने पहले इस प्रार्थना सभा के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किया था, लेकिन बाद में किसी दबाव में आकर उसे रद्द कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने इसी निर्णय और पुलिस के नोटिसों को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं है, जो किसी व्यक्ति को उसके निजी घर में शांतिपूर्वक प्रार्थना करने या सभा आयोजित करने से रोकता हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक ऐसी गतिविधियों से कानून-व्यवस्था प्रभावित नहीं होती या ध्वनि प्रदूषण जैसी समस्या उत्पन्न नहीं होती, तब तक प्रशासन या पुलिस को इसमें दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने नवागढ़ पुलिस द्वारा 18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और 1 फरवरी 2026 को जारी किए गए सभी नोटिसों को निरस्त कर दिया और स्पष्ट निर्देश दिए कि याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच के नाम पर अनावश्यक दबाव बनाना या नागरिकों को परेशान करना स्वीकार्य नहीं है।
सरकारी पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया था कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं और उन्होंने प्रार्थना सभा के लिए अनुमति नहीं ली थी, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि निजी स्थान पर शांतिपूर्ण धार्मिक गतिविधि करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और इसके लिए अनुमति की बाध्यता नहीं हो सकती।
इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे व्यवहार में भी पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए। यह निर्णय आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल के रूप में देखा जाएगा।