लोकसभा में नक्सलवाद पर हुई चर्चा के दौरान सियासत अचानक गर्म हो गई, जब केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने बड़ा दावा करते हुए कहा कि भारत अब लगभग नक्सल-मुक्त हो चुका है और सरकार ने 31 मार्च 2026 तक तय लक्ष्य हासिल कर लिया है। अपने लंबे भाषण में उन्होंने छत्तीसगढ़ की पूर्व कांग्रेस सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उस समय नक्सलियों को संरक्षण मिला, जिससे अभियान में देरी हुई।
शाह ने सदन में यह भी कहा कि 2019 से शुरू की गई रणनीतियों के तहत लगातार ऑपरेशन और विकास कार्यों को आगे बढ़ाया गया, जिसके परिणामस्वरूप अब देश के अधिकांश हिस्सों से नक्सलवाद खत्म हो चुका है। उनके मुताबिक पिछले तीन वर्षों में 706 नक्सली मारे गए हैं, जबकि 4,800 से ज्यादा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर पुनर्वास योजनाओं का हिस्सा बनने का फैसला किया है। उन्होंने दावा किया कि अब केवल दो जिले ही नक्सल प्रभाव वाले बचे हैं।
अपने बयान के दौरान शाह ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद विकास नहीं पहुंचाया गया। उन्होंने यह भी कहा कि बस्तर जैसे क्षेत्रों में अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं—हर गांव तक राशन, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं और लोग अब ‘लाल आतंक’ से मुक्त होकर विकास की राह पर बढ़ रहे हैं।
शाह ने नक्सलवाद की तुलना स्वतंत्रता सेनानियों से किए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि Bhagat Singh और Birsa Munda जैसे महान नेताओं की तुलना हथियार उठाने वाले नक्सलियों से करना गलत और अपमानजनक है। उनके मुताबिक नक्सली संविधान के खिलाफ जाकर निर्दोष लोगों की हत्या करते हैं, जबकि स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था।
हालांकि, शाह के इन आरोपों पर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री Bhupesh Baghel ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने गृह मंत्री के बयान को पूरी तरह गलत बताते हुए कहा कि यह “सरासर झूठ” है। बघेल ने कहा कि अगर केंद्र सरकार के पास उनकी सरकार के खिलाफ कोई ठोस सबूत था, तो उसे पहले ही सार्वजनिक किया जाना चाहिए था।
बघेल ने यह भी कहा कि उनकी सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाकों में लगातार काम किया और कई सुरक्षा कैंप स्थापित किए, जिनकी वजह से आज के ऑपरेशन संभव हो पाए हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर राजनीति से बचने की अपील करते हुए कहा कि नक्सल हिंसा में उनकी पार्टी ने अपने कई वरिष्ठ नेताओं को खोया है, इसलिए इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।
सदन में यह बहस ऐसे समय पर हुई, जब केंद्र सरकार द्वारा तय 31 मार्च 2026 की डेडलाइन पूरी हो रही थी। एक ओर सरकार अपनी उपलब्धियां गिना रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इन दावों पर सवाल खड़ा कर रहा है। साफ है कि नक्सलवाद का मुद्दा अब सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गया है।