छत्तीसगढ़ में नक्सल गतिविधियों को लेकर एक नया और गंभीर दावा सामने आया है, जिसने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है। सुकमा के कोंटा से पूर्व विधायक और आदिवासी नेता मनीष कुंजाम ने आरोप लगाया है कि नक्सलियों के पास से बरामद हुआ सोना देश के भीतर नहीं, बल्कि स्विट्जरलैंड के बैंकों से जुड़ा हुआ हो सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस पूरे मामले की गहराई से जांच करनी चाहिए, ताकि असली नेटवर्क सामने आ सके।
दंतेवाड़ा सर्किट हाउस में मीडिया से बातचीत के दौरान कुंजाम ने कहा कि नक्सली लंबे समय तक “जल, जंगल और जमीन” बचाने की बात करते रहे, लेकिन हकीकत इससे अलग थी। उनके अनुसार, इनका असली लक्ष्य स्थानीय संसाधनों की रक्षा नहीं, बल्कि सत्ता पर कब्जा करना था—यहां तक कि लाल किले पर लाल झंडा फहराने जैसी सोच के साथ यह आंदोलन चलाया गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नक्सलियों के पास सिर्फ स्थानीय फंडिंग ही नहीं, बल्कि विदेशी स्रोतों से भी संसाधन पहुंचते रहे। कुंजाम के मुताबिक, पैसों की सप्लाई देश के भीतर से एजेंट्स के जरिए होती थी, लेकिन सोने जैसे कीमती संसाधन विदेश से जुड़े नेटवर्क के माध्यम से आए हो सकते हैं।
मामले की गंभीरता इस बात से भी बढ़ जाती है कि हाल ही में बीजापुर जिले में सरेंडर करने वाले 25 नक्सलियों के पास से करीब 7 किलो सोना बरामद हुआ था, जिसकी कीमत 11 करोड़ रुपये से ज्यादा आंकी गई। इससे पहले जगदलपुर में भी आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पास से डेढ़ किलो सोना मिला था। इतनी बड़ी मात्रा में सोने की बरामदगी ने सुरक्षा एजेंसियों को भी चौंका दिया है।
कुंजाम ने माइनिंग से जुड़े मुद्दों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई जगहों पर ग्रामीणों ने खदानों के खिलाफ लंबे समय तक आंदोलन किया, लेकिन इसके बावजूद आमदई और रावघाट जैसी खदानें शुरू हो गईं। उनका आरोप है कि नक्सलियों ने इन प्रोजेक्ट्स को रोकने या चालू करने के लिए पैसों की वसूली की और जब उन्हें रकम मिलती थी, तभी काम आगे बढ़ने दिया जाता था।
उन्होंने दावा किया कि इस पूरे नेटवर्क के सबूत उनके पास मौजूद हैं और जरूरत पड़ने पर वे इन्हें सार्वजनिक कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर समय पर पैसे नहीं मिलते थे, तो नक्सली हिंसक घटनाओं को अंजाम देकर दबाव बनाते थे।
यह पूरा मामला अब सिर्फ नक्सल गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें अंतरराष्ट्रीय फंडिंग, अवैध सोना और संगठित नेटवर्क जैसे गंभीर पहलू भी जुड़ते नजर आ रहे हैं। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो पाएगी, लेकिन इससे यह जरूर साफ है कि नक्सलवाद की जड़ें कहीं ज्यादा गहरी और जटिल हो सकती हैं।