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उर्वरक संकट के बीच छत्तीसगढ़ का बड़ा कदम—टिकाऊ खेती की ओर बढ़ता राज्य

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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच Chhattisgarh ने टिकाऊ कृषि की दिशा में एक अहम पहल शुरू की है। Iran से जुड़े संकट और अमेरिका-इजराइल के साथ बढ़ते टकराव के कारण उर्वरक निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार मिलकर किसानों को किसी भी संभावित संकट से बचाने की रणनीति तैयार कर रहे हैं।

इस चुनौती को देखते हुए राज्य में अब वैकल्पिक उर्वरकों के उपयोग को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। किसानों को एनपीके, हरी खाद, जैविक खाद और नैनो उर्वरकों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया जा रहा है, ताकि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सके। Indira Gandhi Krishi Vishwavidyalaya की सिफारिशों के आधार पर सहकारी समितियों और निजी विक्रय केंद्रों के माध्यम से जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि हरित खाद, नीली-हरी शैवाल और जैव उर्वरक जैसे विकल्प फसलों की पोषण जरूरतों का करीब 50 प्रतिशत तक पूरा कर सकते हैं। खासतौर पर धान की खेती में नीली-हरी शैवाल नाइट्रोजन स्थिरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जबकि हरित खाद मृदा की संरचना को बेहतर बनाकर उसकी उर्वरता बढ़ाती है। इसी कारण समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन को भविष्य की कृषि के लिए जरूरी बताया जा रहा है।

राज्य सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि खरीफ सीजन 2026 के लिए उर्वरकों की उपलब्धता बनी रहे। फिलहाल राज्य में लगभग 7.48 लाख मीट्रिक टन खाद का स्टॉक मौजूद है, जिसमें यूरिया, डीएपी, एनपीके, एमओपी और एसएसपी शामिल हैं। केंद्र सरकार द्वारा कुल 15.55 लाख मीट्रिक टन उर्वरक का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसे समय पर उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास जारी हैं।

इसके साथ ही किसानों को उनकी जरूरत के मुताबिक उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए राज्य में जल्द ही ई-उर्वरक वितरण प्रणाली लागू की जाएगी। इस डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल ऐप के जरिए किसानों को उनकी जमीन और फसल के आधार पर अनुशंसित खाद उपलब्ध कराई जाएगी। इससे न सिर्फ पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि जरूरत से ज्यादा या कम आपूर्ति जैसी समस्याओं पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा।

कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ का यह कदम न केवल मौजूदा संकट से निपटने की रणनीति है, बल्कि लंबे समय में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती की दिशा में एक मजबूत पहल के रूप में भी देखा जा रहा है, जिससे किसानों को स्थायी लाभ मिल सकेगा।

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